
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ऑनलाइन बेटिंग ऐप खिलाड़ी के जरिए ठगी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। बेटिंग ऐप खिलाड़ी का पैनल लेकर बहोड़ापुर इलाके में घर के अंदर ही ठगी का कॉल सेंटर चलाया जा रहा था। ऑनलाइन गेम खिलाकर करोड़ों कमाने का झांसा देकर फंसाया जाता था। पहले तो छोटी-छोटी जीत कराकर लोगों को लालच दिया जाता था। जब लोग ज्यादा पैसा लगाते थे तो हारना शुरू हो जाते थे।
इस तरह यह गिरोह लोगों के साथ ठगी कर रहा था। पुलिस ने सरगना सहित 10 लोगों को पकड़ा है। इन्हें गिरफ्तार कर पूछताछ की जा रही है। सरगना ने बिहार और उप्र के बेरोजगार युवकों को नौकरी देने के बहाने यहां बुलाया और ठगी के कॉल सेंटर में काम कराना शुरू कर दिया। किसी को 20 हजार तो किसी को 10 हजार रुपये तनख्वाह मिलती थी। खाने और रहने का भी इंतजाम अपने घर में ही किया था।
बहोड़ापुर स्थित शिव नगर में रहने वाले देवेंद्र उर्फ देवा पुत्र धर्मपाल यादव के घर में ही कॉल सेंटर चल रहा था। एएसपी अनु बेनीवाल को सूचना मिली थी कि यहां ऑनलाइन बेटिंग ऐप के जरिए लोगों को ठगा जा रहा है। एएसपी ने डीएसपी मनीष यादव, क्राइम ब्रांच प्रभारी अमित शर्मा, बहोड़ापुर थाना प्रभारी आलोक परिहार, एसआई धर्मेंद्र शर्मा और इनकी टीम को पड़ताल में लगाया। टीम ने दो दिन तक यहां रेकी की। जब पुष्टि हो गई तो रविवार शाम को छापा मारा। यहां घर में ही कॉल सेंटर बना रखा था। जहां पैनल के जरिए लैपटॉप, मोबाइल से ऑनलाइन बेटिंग के जरिए ठगी की जा रही थी। पुलिस ने 10 लोगों को यहां से पकड़ा।
इंस्टाग्राम पर 3.50 लाख रुपये में पैनल लिया था। एक विज्ञापन दिखा था, जिसमें खिलाड़ी बेटिंग ऐप का पैनल लेकर करोड़ों कमाने की जानकारी थी। सरगना देवा यादव ने यह पैनल लिया और ठगी शुरू कर दी।
इस ऐप का प्रोग्राम इस तरह से डिजाइन है, जिसमें शुरुआत में नए खिलाड़ी को जिताया जाता है। फिर वह अपने आप हारने लगता है। पहले पैसा जमा करने पर ऑनलाइन कॉइन मिलते हैं। इनसे गेम खेलना होता है। इस ऐप पर खुद की क्रिकेट टीम बनाकर गेम खेला जाता था। इसके अलावा मैच पर भी बेटिंग लगती थी। इसके अलावा भी अन्य गेम हैं, जिन पर बेटिंग होती थी।
देवा यादव ने जिन युवकों को नौकरी के बहाने बुलाया था। उन्हें यहां ऑनलाइन बेटिंग का काम दिया। बेरोजगार थे, इसलिए यह भी काम करने को राजी हो गए। इन्हें कमरे से बाहर नहीं निकलने देता था।
इस गिरोह के तार भी विदेश से जुड़े हैं। पैसों की हेराफेरी के लिए म्यूल खातों के नेटवर्क का ही उपयोग होता था। यह खाते भी इन्हें ऑनलाइन ही मिल जाते थे। क्रिप्टो ट्रेडिंग से भुगतान होता था।
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