
डिजिटल डेस्क, नईदुनिया। दिल्ली के लाल किला क्षेत्र में पिछले वर्ष 10 नवंबर को हुए उच्च तीव्रता वाले वाहन-जनित आईईडी विस्फोट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बड़ा खुलासा किया है। एजेंसी के अनुसार, इस कथित आतंकी साजिश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्लेटफॉर्म और डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग किया गया।
एनआईए ने 14 मई को विशेष अदालत में 7,500 पृष्ठों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की। आरोपपत्र में दावा किया गया है कि आरोपियों ने विस्फोटक तैयार करने, रॉकेट IED बनाने और हमलों की योजना तैयार करने के लिए तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल किया।
जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों में शामिल जसिर बिलाल वानी कथित तौर पर अंसार गजवत-उल-हिंद (AGUH) के अंतरिम आतंकी मॉड्यूल का “इन-हाउस इंजीनियर” बनकर काम कर रहा था। इस मॉड्यूल का संबंध भारतीय उपमहाद्वीप में सक्रिय अल-कायदा (AQIS) से बताया गया है।
गृह मंत्रालय पहले ही AQIS और उससे जुड़े संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुका है। एनआईए का दावा है कि आरोपियों ने वैज्ञानिक तरीके से विस्फोटक उपकरणों का निर्माण और परीक्षण किया।
चार्जशीट के मुताबिक, जसिर बिलाल वानी 2024-25 के दौरान हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल फलाह विश्वविद्यालय परिसर में दो से तीन बार रुका था। एजेंसी का आरोप है कि वह वहां कथित आतंकी साजिश के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करने पहुंचा था।
जांच के दौरान सामने आया कि विश्वविद्यालय से जुड़े तीन डॉक्टरों की भूमिका भी संदिग्ध रही। इनमें डॉ. अदील अहमद राथर, डॉ. उमर उन नबी और डॉ. मुज़म्मिल शकील के नाम शामिल हैं।
NIA के अनुसार, डॉ. अदील अहमद राथर ने जसिर का परिचय डॉ. उमर उन नबी से कराया था। डॉ. उमर को विस्फोटक से भरी कार का चालक बताया गया है। चार्जशीट में कहा गया है कि विस्फोट में 11 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे।
जांच एजेंसी का दावा है कि डॉ. अदील ने विस्फोटक सामग्री जुटाने में सहायता की। इसमें पिसी हुई चीनी और एनपीके उर्वरक के रूप में पोटेशियम नाइट्रेट शामिल था। वहीं डॉ. उमर ने कथित तौर पर रॉकेट आईईडी तैयार करने और तकनीकी मार्गदर्शन देने का काम किया।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चार्जशीट में कहा गया है कि जसिर ने यूट्यूब और चैटजीपीटी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर “रॉकेट कैसे बनाया जाए” और “मिश्रण का अनुपात क्या होना चाहिए” जैसी जानकारी खोजी।
एनआईए का कहना है कि यह मामला आतंकी गतिविधियों में एआई और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के कथित दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण है। जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने डिजिटल माध्यमों से जुटाई गई जानकारी के आधार पर विस्फोटक उपकरण विकसित किए।
चार्जशीट के अनुसार, जसिर, डॉ. उमर, डॉ. मुज़म्मिल और अन्य आरोपियों ने जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के काजीगुंड जंगल में रॉकेट आईईडी तैयार कर उनका परीक्षण किया।
जसिर के खुलासों के बाद एनआईए की टीमों ने जंगल के अंदरूनी हिस्सों में व्यापक तलाशी अभियान चलाया और कथित तौर पर उपकरणों के अवशेष बरामद किए। इसके अलावा, मट्टन के पास यूशमुर्ग जंगल में सिलेंडर आधारित आईईडी का परीक्षण किए जाने की बात भी सामने आई है। एनआईए ने इन स्थानों से परीक्षण के अवशेष जब्त करने का दावा किया है।
NIA की जांच में यह भी सामने आया कि डॉ. उमर ने जसिर को दो ड्रोन उपलब्ध कराए थे। एजेंसी के मुताबिक, आरोपियों की योजना ड्रोन की उड़ान क्षमता और भार वहन क्षमता बढ़ाने की थी।
चार्जशीट में कहा गया है कि इन ड्रोन में विस्फोटक लगाकर उन्हें हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी। कथित तौर पर इसका उद्देश्य कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना था।
जांच एजेंसी के अनुसार, दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 के बीच जसिर ने अपने फ्लिपकार्ट खाते से कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ऑर्डर किए। इनमें सेंसर-इंडक्टिव प्रॉक्सिमिटी स्विच, हीट गन, पीजो प्लेट, रेडियो फ्रीक्वेंसी ट्रांसमीटर और रिसीवर किट, सोल्डरिंग किट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री शामिल थी।
एनआईए का दावा है कि इन उपकरणों का उपयोग आईईडी के ट्रिगर तंत्र को तैयार करने में किया गया। खरीद के लिए धनराशि कथित तौर पर डॉ. उमर द्वारा उपलब्ध कराई गई थी।
एनआईए ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि वैज्ञानिक और फोरेंसिक जांच के दौरान एक व्यापक “जिहादी साजिश” का खुलासा हुआ। एजेंसी के अनुसार, आरोपियों में शामिल कुछ चिकित्सा पेशेवर कथित तौर पर कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और AQIS/AGUH से प्रेरित होकर हमले की योजना बना रहे थे। जांच फिलहाल जारी है और एनआईए इस पूरे नेटवर्क से जुड़े अन्य संभावित पहलुओं की भी पड़ताल कर रही है।