
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। केंद्र सरकार के फैसले के बाद मध्य प्रदेश के दो जिलों के किसानों के लिए खुशखबरी हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश में कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based Industries) को बढ़ावा देने और किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में 'एथेनॉल उत्पादन' एक गेम-चेंजर साबित होने जा रहा है।
केंद्र सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (Ethanol Blending Program) के तहत राज्य में गन्ने से एथेनॉल बनाने की कवायद तेजी से आगे बढ़ रही है। इससे न केवल देश का ईंधन आयात बिल कम होगा, बल्कि सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसानों की किस्मत भी चमकेगी।
आइए समझते हैं कि मध्य प्रदेश के किन जिलों में गन्ने का सबसे अधिक उत्पादन होता है और एथेनॉल का यह गणित किसानों की जेब को कैसे और कितना फायदा पहुंचाएगा।
मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा गन्ने की खेती के लिए बेहद मुफीद माना जाता है। राज्य के प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में मुख्य रूप से ये नाम शामिल हैं...
अब तक किसान पूरी तरह से केवल चीनी मिलों (Sugar Mills) पर निर्भर रहते थे, जिससे अक्सर भुगतान में देरी और औने-पौने दाम मिलने की समस्या रहती थी। लेकिन एथेनॉल उत्पादन शुरू होने से समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे...

ये तस्वीर एआई से बनाई गई है
जब गन्ने का इस्तेमाल सीधे एथेनॉल बनाने के लिए होगा, तो मिलों की आमदनी बढ़ेगी। चीनी के मुकाबले एथेनॉल से मिलों को तुरंत कैश-फ्लो मिलता है। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा, उन्हें अपने गन्ने का उचित और बढ़ा हुआ दाम (Fair and Remunerative Price) मिल सकेगा।
पारंपरिक रूप से चीनी मिलों द्वारा किसानों का भुगतान हफ्तों या महीनों तक अटका रहता था। एथेनॉल को तेल कंपनियां (जैसे IOCL, BPCL) तुरंत खरीद लेती हैं और मिलों को 21 दिनों के भीतर भुगतान हो जाता है। इससे मिलों के पास नकदी की कमी नहीं होगी और किसानों को उनके गन्ने का पैसा समय पर (महीनों के बजाय कुछ दिनों में) मिल जाएगा।
अक्सर देखा गया है कि जब किसी साल गन्ने का बहुत अधिक उत्पादन होता है, तो चीनी के दाम गिर जाते हैं और मिलें किसानों से गन्ना खरीदना कम कर देती हैं। एथेनॉल प्लांट होने से अतिरिक्त गन्ने को सीधे ईंधन (Biofuel) बनाने में डाइवर्ट कर दिया जाएगा। इससे बाजार में गन्ने की मांग हमेशा बनी रहेगी और रिकॉर्ड उत्पादन के बाद भी दाम नहीं गिरेंगे।
गन्ने की पेराई के बाद बचने वाली 'खोई' (Bagasse) और 'मैल' (Pressmud) का उपयोग भी एथेनॉल और जैविक खाद बनाने में होता है। इस कचरे की व्यावसायिक वैल्यू बढ़ने से किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रति क्विंटल अधिक मुनाफा हासिल होगा।
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