• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
naidunia animated logo
  • मेरी खबरें
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • कोरोना वायरस
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • स्‍वतंत्रता दिवस
  • सावन माह
  • मानसून
  • मध्‍य प्रदेश की खबरें
  • राशि परिवर्तन
  • वास्‍तु शास्‍त्र
  • स्वच्छ जल
  • होम
  • बिज़नेस

कौन थे दादा अब्दुल्ला, जिन्होंने महात्मा गांधी को दी थी पहली नौकरी? उस 1 साल के एग्रीमेंट की इनसाइड स्टोरी

पोरबंदर के एक रिश्तेदार की मध्यस्थता से दादा अब्दुल्ला ने गांधी जी को 1 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर दक्षिण अफ्रीका आमंत्रित किया। इस कार्य के बदले गांधीजी क...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sun, 16 Aug 2026 12:33:36 PM (IST)Updated Date: Sun, 16 Aug 2026 12:33:36 PM (IST)
कौन थे दादा अब्दुल्ला, जिन्होंने महात्मा गांधी को दी थी पहली नौकरी? उस 1 साल के एग्रीमेंट की इनसाइड स्टोरी
कौन थे दादा अब्दुल्ला, जिन्होंने महात्मा गांधी को दी थी पहली नौकरी?

HighLights

  1. बैरिस्टर गांधीजी को भारत में नहीं मिल रहा था काम
  2. दादा अब्दुल्ला ने दिया था महात्मा गांधी को पहला ब्रेक
  3. गांधी जी को पहली सैलरी के रूप में मिले थे 105 यूरो

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। पूरी दुनिया मोहनदास करमचंद गांधी को उनके सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों के लिए याद करती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधीजी को 'महात्मा' बनाने के सफर की शुरुआत दक्षिण अफ्रीका में मिली एक नौकरी से हुई थी। भारत के एक बड़े व्यवसायी दादा अब्दुल्ला द्वारा दिया गया वह पहला लीगल कॉन्ट्रैक्ट गांधीजी के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वॉइंट साबित हुआ।

कौन थे व्यापारी दादा अब्दुल्ला?

दादा अब्दुल्ला मेमन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक बेहद समृद्ध और प्रभावशाली उद्योगपति थे। 1890 के दशक में उन्होंने अपने भाई अब्दुल करीम झावेरी के साथ मिलकर दक्षिण अफ्रीका में 'दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी' की नींव रखी थी। यह कंपनी भारत, ब्रिटेन और जर्मनी से व्यापारिक सामान का आयात-निर्यात करती थी। डरबन में स्थित इस फर्म के पास अपने मालवाहक जहाजों का काफिला था, जिससे भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार को नई गति मिली।


गांधीजी को कैसे मिली पहली नौकरी?

साल 1893 में ब्रिटेन से कानून की पढ़ाई पूरी करके लौटने के बाद युवा गांधीजी भारत में अपनी वकालत स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उसी समय दादा अब्दुल्ला की फर्म को 40,000 पाउंड के एक पारिवारिक वित्तीय मुकदमे की पैरवी के लिए एक शिक्षित और अंग्रेजी जानने वाले भारतीय कानूनी सलाहकार की जरूरत थी।

पोरबंदर के एक रिश्तेदार की मध्यस्थता से दादा अब्दुल्ला ने गांधीजी को 1 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर दक्षिण अफ्रीका आमंत्रित किया। इस कार्य के बदले गांधीजी को फर्स्ट क्लास यात्रा, रहने-खाने का पूरा खर्च और 105 पाउंड का शुल्क प्रदान किया गया। मई 1893 में जब गांधीजी डरबन पहुंचे, तो दादा अब्दुल्ला ने खुद उनका स्वागत किया।

यह भी पढ़ें- इंदौर के 106 साल के बसंतीलाल की गांधीजी से मुलाकात के बाद बदली जिंदगी, गोली झेली, फिर भी अंग्रेजों से लड़ी जंग

पीटरमैरित्ज़बर्ग की वह ऐतिहासिक घटना

केस के सिलसिले में जब गांधीजी ट्रेन द्वारा डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे, तब पीटरमैरित्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन पर उन्हें रंगभेद का शिकार होना पड़ा। प्रथम श्रेणी का वैध टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया। इस अपमान और अन्याय ने गांधीजी के भीतर नागरिक अधिकारों की लड़ाई की चिंगारी सुलगा दी, जिसने आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदल दिया।