नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर। नई दिल्ली के लाल किला मैदान में 24 मई को आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम में शामिल होने के लिए सरगुजा संभाग के जनजातीय समाज के लोग विशेष ट्रेन से नई दिल्ली के लिए रवाना हुए। एक ट्रेन सुबह पांच बजे अंबिकापुर से रवाना हुई।
दूसरी ट्रेन शाम चार बजे जनजातीय समाज के लोगों को लेकर रवाना हुई। समाज से जुड़े लोग स्वयं के साधनों से भी दिल्ली के लिए रवाना हो रहे हैं।
23 मई को सभी दिल्ली पहुंच जाएंगे
संभाग भर से जनजातीय समाज के लोग गुरुवार को ही अंबिकापुर पहुंचने लगे थे। पटेलपारा स्थित सामाजिक भवन में सभी के लिए व्यवस्था की गई थी। यहां भोजन और विश्राम के बाद समाज के लोगों को रेलवे स्टेशन तक ले जाने बस की व्यवस्था की गई थी। रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार पर जनजातीय समाज के लोगों का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। 23 मई को सभी दिल्ली पहुंच जाएंगे।
दिल्ली में पांच स्थानों से निकलेगी रैली
डिलिस्टिंग की मांग को लेकर जनजातीय समाज द्वारा नई दिल्ली में सांस्कृतिक समागम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें देशभर से जनजातीय समाज के लोगों की सहभागिता होगी। दिल्ली के पांच स्थानों से एक साथ जनजातीय समाज के लोग बाजे-गाजे और परंपरागत वेशभूषा के साथ रैली निकालेंगे।
पांचों रैली लाल किला मैदान में होगी। यहां गृहमंत्री अमित शाह के मुख्य आतिथ्य में कार्यक्रम होगा। जनजातीय समाज द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर मतांतरित लोगों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने की मांग की जाएगी।
कार्तिक उरांव ने सबसे पहले उठाई थी मांग
जनजाति सुरक्षा मंच के प्रांतीय सह संयोजक इंदर भगत ने बताया कि मतांतरित लोगों को अनुसूचित जनजाति की सूची से पृथक करने की मांग को सबसे पहले केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय कार्तिक उरांव ने वर्ष 1967 में लोकसभा में उठाया था। उनके प्रयासों के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया गया था।
जेपीसी की रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई थी कि जिसने जनजातीय आदि मत और विश्वासों का परित्याग कर ईसाई या इस्लाम मत ग्रहण कर लिया हो, उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाए। हालांकि, आज तक इस सिफारिश को कानून का रूप नहीं दिया जा सका। बाद में वर्ष 2006 में जनजातीय सुरक्षा मंच का गठन किया गया, जिसने इस मांग को संगठित आंदोलन का स्वरूप दिया।
मतांतरित उठा रहे जनजातियों का लाभ
जनजातीय सुरक्षा मंच के अनुसार देश में लगभग 18 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति समाज का मतांतरण हो चुका है, यही मतांतरित वर्ग जनजातीय आरक्षण और शासकीय योजनाओं का लगभग 80 प्रतिशत लाभ प्राप्त कर रहा है। शेष 82 प्रतिशत मूल जनजातीय समाज को मात्र 20 प्रतिशत लाभ मिल पा रहा है।
मंच के प्रांतीय सहसंयोजक इंदर भगत का कहना है कि यह स्थिति न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ा रही है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। आज मूल जनजातीय समाज एकजुट होकर अपनी मांगों को लेकर जागरूक हुआ है।
जनसंपर्क से बना वातावरण,दिल्ली जाने का गजब उत्साह
जनजातीय सुरक्षा मंच द्वारा लगातार ज्ञापन, हस्ताक्षर अभियान, जिला व प्रांत स्तरीय रैलियों के माध्यम से डिलिस्टिंग कानून की मांग को जन-जन तक पहुंचाया गया। संगठन का नारा है ''जो नहीं भोलेनाथ का, वह नहीं हमारी जाति का।'' इसके माध्यम से मंच यह संदेश देता रहा है कि जनजातीय पहचान आस्था, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी है।
दिल्ली में रैली से पहले उत्तर छत्तीसगढ़ के जनजाति बहुल जिलों में गांव-गांव बैठकें आयोजित की गई थी। समाज के लोगों से लगातार संपर्क किया गया। डिलिस्टिंग की आवश्यकता क्यों है,इस विषय पर जानकारी दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि स्वस्फूर्त समाज के लोग आगे आए और दिल्ली के लिए रवाना हुए।
दिल्ली में जनजातियों की रैली के रूट
- राजघाट से लाल किला तक 2.5 किमी
- रामलीला मैदान से लाल किला तक 2.8 किमी
- अजमेरी गेट से लाल किला तक 2.5 किमी तक
- कुदसिया बाग से लाल किला तक दो किलोमीटर
- श्यामगिरी मन्दिर से लाल किला तक 3.5 किमी