रीषभ सिन्हा, नईदुनिया, डौंडीलोहारा। करीब 80 वर्षीय गणेशिया बाई की उम्र अब बिस्तर पर आराम करते हुए गुजर रही है। जीवन के इस पड़ाव पर उनके और 60 वर्षीय भाई पोषण लाल देवांगन के बीच रिश्तों में फिर मिठास लौट आई है। कभी आठ एकड़ जमीन के विवाद ने दोनों को करीब 35 साल तक कानूनी लड़ाई में उलझाए रखा था।
मृत बहन राधा बाई की पहचान अपनाकर पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगने के मामले में गणेशिया बाई को दोषी ठहराया गया। अब बिलासपुर हाई कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा पहले से जेल में बिताई गई 16 दिन की अवधि तक सीमित कर दी है। एक तरफ अदालत में कानूनी लड़ाई का अंत करीब आया, तो दूसरी तरफ परिवार ने पुराने गिले-शिकवे भुलाकर रिश्तों को फिर से संवार लिया।
लंबी लड़ाई के बाद अब सामान्य हुए संबंध
बालोद जिले के डौंडीलोहारा क्षेत्र की इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि जिस जमीन के लिए भाई-बहन के बीच दशकों तक विवाद चला, उसी परिवार में अब मेल-मिलाप है। परिवार के मुताबिक, गणेशिया बाई और उनके भाई पोषण लाल के संबंध सामान्य हो गए हैं। दोनों एक ही गांव में पड़ोसी की तरह रहते हैं। परिवार के सदस्य पुराने विवाद को पीछे छोड़कर नई शुरुआत कर चुके हैं।
मृत बहन की पहचान अपनाई
ग्राम पासौद निवासी सरजू राम देवांगन और उनकी पत्नी सुखबती के परिवार में दो बेटे और तीन बेटियां थीं। परिवार के पास करीब आठ एकड़ जमीन थी। तीन बेटियों में से एक राधा बाई की जन्म के लगभग 15 दिन बाद ही मृत्यु हो गई थी। अन्य दो बेटियों में गणेशिया बाई भी शामिल थीं। दोनों की शादी हो गई थी।
हिस्सेदारी का मामला आया और बढ़ गया तनाव
शादी के बाद बेटियों ने पिता की संपत्ति में अपना नाम हटवाकर जमीन भाइयों के नाम रहने दी थी। उस समय संपत्ति को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं था। हालांकि, कुछ वर्षों बाद जमीन में हिस्सेदारी का मामला सामने आया और परिवार के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि गणेशिया बाई ने अपनी मृत बहन राधा बाई की पहचान अपनाकर पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगने का प्रयास किया। उनके भाई पोषण लाल देवांगन ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि राधा बाई की मृत्यु जन्म के लगभग 15 दिन बाद ही हो गई थी। इसी विवाद ने आगे चलकर आपराधिक मामले का रूप ले लिया।
वैवाहिक परेशानियों के बीच मायके लौटी थीं गणेशिया
गणेशिया बाई के 45 वर्षीय बेटे चंद्र कुमार देवांगन और परिवार के अनुसार, उनकी माता की पहली शादी हड़गहन में हुई थी। वैवाहिक जीवन में परेशानियों और पति के साथ विवाद के कारण वह मायके लौट आई थीं। परिवार का आरोप है कि इसी दौरान गांव के कुछ लोगों ने उन्हें पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए प्रेरित किया। गणेशिया बाई अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थीं और दूसरों की बातों में आ गईं। उनका आरोप है कि महिला की परिस्थितियों का फायदा उठाकर उन्हें संपत्ति में हिस्सेदारी मांगने के लिए उकसाया गया। हालांकि, गांव के लोगों द्वारा साजिश रचने या उन्हें बहकाने की बात की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध न्यायिक विवरण में नहीं होती है।
1991-92 में शुरू हुई कानूनी लड़ाई
वर्ष 1991-92 में नायब तहसीलदार, डौंडीलोहारा के समक्ष राजस्व प्रकरण की सुनवाई के दौरान गणेशिया बाई पर अपनी मृत बहन राधा बाई की पहचान अपनाकर पेश होने का आरोप लगा। पूर्व जनपद सदस्य और उपसरपंच पोषण लाल देवांगन ने इस दावे को चुनौती दी। इसके बाद जन्म-मृत्यु पंजी के अभिलेखों सहित अन्य दस्तावेजों के आधार पर मामले की जांच हुई। 30 अप्रैल 2016 को जिला व सत्र न्यायालय ने गणेशिया बाई को झूठे साक्ष्य देने के अपराध में दोषी ठहराया। अदालत ने दोनों अपराधों में छह-छह महीने के सश्रम कारावास और 500-500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अपील न्यायालय ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी। इसके बाद गणेशिया बाई ने हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।
परिवार ने भुलाए गिले-शिकवे, अदालत में जारी रही प्रक्रिया
लंबे समय तक चले विवाद के बाद पोषण लाल देवांगन और गणेशिया बाई के परिवार ने पुराने मनमुटाव को भुलाने का निर्णय लिया। दोनों पक्षों ने आपसी समझौते के जरिए मामले को समाप्त करने की कोशिश की। परिवार चाहता था कि जमीन के विवाद के कारण रिश्तों में आई दूरी खत्म हो और भाई-बहन फिर सामान्य जीवन जी सकें। हालांकि, मामला आपराधिक प्रकृति का होने के कारण आपसी समझौते से न्यायिक प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई। मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा और अदालत में सुनवाई जारी रही।
हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, सजा 16 दिन तक सीमित
बिलासपुर हाई कोर्ट में गणेशिया बाई की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन ने मूल दस्तावेजों के बजाय छायाप्रतियों पर भरोसा किया और स्वतंत्र गवाहों की पर्याप्त जांच नहीं की। उनकी उम्र और मामले के लंबे समय तक चलने के आधार पर सजा कम करने की मांग की गई। राज्य की ओर से दोषसिद्धि को उचित बताया गया। जस्टिस सुधीर कुमार ने जन्म-मृत्यु पंजी के अभिलेखों और राजस्व कार्यवाही से जुड़े साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सिविल कोर्ट व सत्र न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया। हालांकि, महिला की उम्र और घटना के करीब 35 साल बाद तक चली कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए उनकी सजा पहले से जेल में बिताई गई 16 दिन की अवधि तक सीमित कर दी गई। चूंकि वह 16 दिन जेल में रह चुकी हैं, इसलिए अब उन्हें शेष सजा भुगतने के लिए जेल जाने की जरूरत नहीं होगी।
अब एक ही गांव में पड़ोसी बनकर रह रहे भाई-बहन
करीब साढ़े तीन दशक तक चले इस विवाद के बाद परिवार में रिश्तों की स्थिति बदल गई है। गणेशिया बाई के तीन बेटे हैं। उनके बेटे चंद्र कुमार देवांगन के मुताबिक, अब उनकी माता और मामा पोषण लाल देवांगन के संबंध अच्छे हैं। दोनों परिवार एक ही गांव में पड़ोसी की तरह रहते हैं और सामान्य पारिवारिक मेलजोल बना हुआ है। आठ एकड़ जमीन से शुरू हुआ विवाद कानूनी लड़ाई और सजा तक पहुंचा, लेकिन अब परिवार पुराने मनमुटाव को पीछे छोड़ चुका है। अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखी और उम्र को देखते हुए सजा में राहत दी। वहीं, परिवार ने रिश्तों को फिर से जोड़कर नई शुरुआत की है।