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दुर्ग के गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ होगा पद्मविभूषण तीजन बाई का अंतिम संस्कार

पद्मविभूषण तीजन बाई का निधन भारतीय लोककला के लिए एक अपूरणीय क्षति है। पंडवानी की 'कापालिक शैली' को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने वाली तीजन बाई का अंति...और पढ़ें

By Ramkrishna DongreEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Sun, 05 Jul 2026 10:18:17 AM (IST)Updated Date: Sun, 05 Jul 2026 10:19:38 AM (IST)
दुर्ग के गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ होगा पद्मविभूषण तीजन बाई का अंतिम संस्कार
दुर्ग जिले के गनियारी में स्थित तीजन बाई का पैतृक निवास।

HighLights

  1. पंडवानी की स्वर-सम्राज्ञी का गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार
  2. तंबूरे की झंकार से विश्व पटल पर लोककला को दिलाई सात समंदर पार पहचान
  3. संघर्षों की भट्टी में तपकर तीजन बनीं भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का गौरवशाली वैश्विक चेहरा

रामकृष्ण डोंगरे, नईदुनिया प्रतिनिधि, भिलाई/गनियारी। छत्तीसगढ़ की माटी की गौरव और पंडवानी लोकगायन शैली की पर्याय पद्मविभूषण तीजन बाई का रविवार तड़के 3:15 बजे निधन हो गया। उनके निधन की सूचना से कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव, दुर्ग जिले के गनियारी में राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने तीजन बाई के राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा की है। इधर, गनियारी गांव में उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां युद्धस्तर पर जारी हैं। भारी बारिश के बावजूद प्रशासन अंतिम संस्कार स्थल पर वाटरप्रूफ पंडाल और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में जुटा है। उनके प्रशंसक और कलाकार श्रद्धांजलि देने के लिए गनियारी पहुंचने लगे हैं। सुबह 11:00 बजे के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न होगी।


संघर्षों से विश्व मंच तक का सफर

8 अगस्त 1956 को भिलाई के पास गनियारी में जन्मी तीजन बाई का बचपन अभावों और श्रम के बीच बीता। उन्हें औपचारिक शिक्षा तो नहीं मिली, लेकिन उनके नाना ने उन्हें महाभारत की जो कहानियां सुनाईं, वे उनके जीवन का आधार बन गईं। मात्र 15 वर्ष की आयु में जब उन्होंने रूढ़ियों को तोड़कर सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाना शुरू किया, तो उन्हें सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। उन्होंने एक छोटी सी झोपड़ी में रहकर भी अपने तंबूरे का साथ नहीं छोड़ा।

पंडवानी में क्रांतिकारी बदलाव

तीजन बाई ने पंडवानी की 'वेदमती' शैली (बैठकर गायन) को छोड़कर पुरुष-प्रधान 'कापालिक शैली' (खड़े होकर अभिनय करना) को अपनाया। तंबूरे को भीम की गदा या अर्जुन का गांडीव बनाने की उनकी अद्भुत कला ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति का जादू ऐसा था कि भाषा की दीवारें टूट गईं और वे पेरिस, लंदन से लेकर टोक्यो तक की मंचों पर छाई रहीं।

इंदिरा गांधी से भारत एक खोज तक

उनके जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब महान रंगमंच कलाकार हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष उनकी प्रस्तुति ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर स्थापित कर दिया। इसके बाद श्याम बेनेगल की श्रृंखला 'भारत एक खोज' ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। 1986 में भिलाई इस्पात संयंत्र (सेल) से जुड़ने के बाद उन्होंने एक कर्मचारी के रूप में भी कीर्तिमान स्थापित किए और सेल की पहली महिला कर्मी बनीं, जिन्हें पद्म सम्मान मिले।

पुरस्कारों की गौरवशाली श्रृंखला

तीजन बाई के अनवरत योगदान के लिए उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मविभूषण' से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, गांधी रत्न, और जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। आज तीजन बाई के निधन से भारतीय लोकसंगीत की सबसे प्रभावशाली आवाज शांत हो गई है, लेकिन उनकी पंडवानी की गूंज आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।