
नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर: शहर के कम्पनी बाजार में आइडीएसएमटी योजना के तहत नियमों को ताक पर रखकर हस्तांतरित की गई 29 दुकानों के प्रकरण में आखिरकार नगर निगम प्रशासन को निर्णय लेना पड़ा। सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मिश्रा की शिकायत और सत्ता पक्ष के पार्षदों के दबाव के बाद नगर निगम ने सभी दुकानों पर किराया अधिरोपित कर दिया है। प्रति दुकान प्रतिमाह 250 रुपये के हिसाब से अब तक लगभग 22 लाख रुपये का किराया बनता है। इसमें से 18 लाख रुपये की वसूली भी हो चुकी है। शेष राशि की वसूली प्रक्रिया जारी है। 10 वर्षों से अधिक समय तक बिना किराया लिए दुकानों का संचालन होता रहा, लेकिन नगर निगम के जिम्मेदार अफसर आंख मूंदे बैठे रहे।
सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मिश्रा ने कलेक्टर सरगुजा को ज्ञापन सौंपकर बताया था कि वर्ष 2015 में कम्पनी बाजार में रजाई-गद्दा व्यवसाय से जुड़े व्यापारियों को आईडीएसएमटी योजना के अंतर्गत 29 दुकानों का हस्तांतरण कर दिया गया था। जबकि योजना में हस्तांतरण का नहीं, बल्कि केवल आबंटन का प्रविधान है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के नियमों के अनुसार दुकानों के आबंटन के लिए कलेक्टर की स्वीकृति आवश्यक होती है।
आरोप है कि बिना प्रक्रिया अपनाए दुकानों को दे दिया गया था। कैलाश मिश्रा ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, नियम विरुद्ध हस्तांतरित दुकानों को निगम के अधिकार क्षेत्र में वापस लेने और नियमानुसार आबंटन कर निगम के राजस्व में वृद्धि करने की मांग की थी। आखिरकारनगर निगम ने सभी दुकानों पर किराया अधिरोपित कर राशि वसूली भी शुरू कर दी है।सबसे बड़ा सवाल नगर निगम की कार्यशैली पर उठ रहा है। 2015 में दुकानें हस्तांतरित हुईं।
तब से 2025 तक यानी 10 साल से अधिक समय बीत गया, लेकिन नगर निगम ने एक बार भी किराया मांगने की जहमत नहीं उठाई। न तो कोई अनुबंध किया गया, न ही किराया तय हुआ। सरकारी संपत्ति पर कब्जा जमाए दुकानदार मौज काटते रहे और निगम के अफसर फाइलों में उलझे रहे। यदि सामाजिक कार्यकर्ता शिकायत न करते और पार्षद सदन में आवाज न उठाते तो शायद यह खेल आगे भी चलता रहता। अनुमानित 22 लाख रुपये का राजस्व डूबने से निगम की वित्तीय सेहत पर भी असर पड़ना स्वाभाविक था।
सामान्य सभा में भी उठा था मुद्दा
यह प्रकरण नगर निगम की सामान्य सभा की बैठक में भी जोर-शोर से उठा था। सत्ता पक्ष के पार्षदों ने ही नियम विरुद्ध दुकान हस्तांतरण और वर्षों से किराया वसूली न होने पर सवाल खड़े किए थे। पार्षदों का आरोप था कि निगम को हर माह हजारों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। अधिकारियों की मिलीभगत से दुकानदार बिना किराया दिए कारोबार कर रहे हैं। सदन में हंगामे के बाद महापौर ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया था।
दबाव में जागा निगम, किराया तय कर शुरू की वसूली
लगातार शिकायतों और सदन में उठे सवालों के बाद नगर निगम प्रशासन हरकत में आया। निगम ने 29 दुकानों का सर्वे कराकर प्रति दुकान 250 रुपये प्रतिमाह किराया निर्धारित किया। वर्ष 2015 से अब तक की गणना करने पर कुल किराया राशि लगभग 22 लाख रुपये बैठती है। निगम के राजस्व विभाग ने वसूली अभियान चलाकर अब तक 18 लाख रुपये वसूल लिए हैं। शेष चार लाख रुपये की वसूली के लिए दुकानदारों को नोटिस जारी किए गए हैं। निगम अधिकारियों का कहना है कि राशि नहीं देने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
नई सब्जी मंडी में दुकान की उम्मीद में दुकानदार
किराया अधिरोपित होने के बाद दुकानदारों में खलबली है। दुकानदारों को उम्मीद है कि शहर में विकसित हो रही नई सब्जी मंडी में उनके लिए भी व्यवस्था की जाएगी। तब वे ये दुकानें छोड़ देंगे। हालांकि निगम ने साफ किया है कि जब तक दुकानें उनके पास हैं, किराया देना ही होगा। नियमों के विपरीत हुए आवंटन को अब नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, लेकिन पुराने नुकसान की भरपाई कौन करेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। थोक सब्जी मंडी में दुकानों के आबंटन में अभी देरी है।
नियमों के विपरीत जाकर दे दी थी दुकानें
बिना कलेक्टर की अनुमति, बिना किराया तय किए, बिना अनुबंध के सरकारी दुकानें दे देना और फिर 10 साल तक भूल जाना, प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा है। जब योजना में हस्तांतरण का प्रविधान ही नहीं था, तो किसके आदेश पर फाइल चली और किसने हस्ताक्षर किए। राजस्व शाखा, संपत्ति शाखा और तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। नगर निगम यदि समय पर जाग जाता तो हर साल करीब दो लाख रुपये का राजस्व मिलता। अब जब किराया वसूली शुरू हुई है तो इसे नजीर मानकर निगम को अपनी सभी संपत्तियों का भौतिक सत्यापन कराना चाहिए। कितनी दुकानें, कितने भवन और कितनी जमीनें ऐसे ही बिना किराया के उपयोग हो रही हैं, इसकी जांच जरूरी है। जिस दौर में आबंटन हुआ तब निगम में कांग्रेस की सरकार थी।
वर्जन
प्रति दुकान प्रति माह 250 रुपये का किराया अधिरोपित किया गया है। लगभग 22 लाख रुपये किराया है। अभी तक लगभग 18 लाख रुपये वसूल कर लिए गए हैं। शेष राशि जमा कराने की प्रक्रिया चल रही है।डीएन कश्यप आयुक्त,नगर निगम अंबिकापुर
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