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नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। आईएएस अधिकारी आनंद मसीह का उरांव अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाणपत्र रद्द करने के मामले में हाई कोर्ट ने छानबीन समिति का आदेश निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि समिति ने पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के बावजूद उन्हें प्रतिकूल गवाहों से जिरह करने और अपने बचाव में मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने का प्रभावी अवसर नहीं दिया। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने मामला दोबारा छानबीन समिति को भेजते हुए 90 दिनों के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है। तब तक निरस्त आदेश के आधार पर उनकी सेवा, वेतन और सेवानिवृत्ति-पेंशन संबंधी लाभों पर कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
आनंद मसीह वर्तमान में रायपुर में पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण के सचिव हैं। उन्होंने छानबीन समिति के 24/27 फरवरी 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। समिति ने 22 जनवरी 1981 को जारी उनका उरांव अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र रद्द कर दिया था और नियमानुसार आगे की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए थे।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके दादा बलदेव प्रसाद वर्ष 1915 में तत्कालीन मध्यप्रदेश के बिलासपुर क्षेत्र में आकर बसे थे। उनके पिता ने भी यहां जमीन खरीदी थी। आनंद मसीह को वर्ष 1981 में जांच के बाद उरांव जनजाति का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर वे वर्ष 1991 में मध्यप्रदेश में उप कलेक्टर के पद पर चयनित हुए थे।
उनके सामाजिक दर्जे को लेकर शिकायत मिलने पर वर्ष 2007 में छानबीन समिति ने प्रमाणपत्र रद्द कर दिया था। आनंद मसीह ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने 24 जुलाई 2018 को जांच प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाते हुए समिति का आदेश निरस्त कर नए सिरे से जांच करने कहा था। राज्य की अपील भी 29 अगस्त 2019 को खारिज हो गई थी। इसके बाद समिति ने जनवरी 2021 में नया नोटिस जारी कर दोबारा जांच की और फरवरी 2023 में फिर प्रमाणपत्र रद्द कर दिया।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि समिति ने पुराने न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं किया और उनके द्वारा व्यक्तिगत सुनवाई तथा मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने की इच्छा जताने के बावजूद प्रभावी अवसर नहीं दिया। वहीं, राज्य ने तर्क दिया कि प्रमाणपत्र धारक पर अपना सामाजिक दर्जा साबित करने का दायित्व है और याचिकाकर्ता ने आवश्यक पुराने दस्तावेज तथा तीन पीढ़ियों का वंश-विवरण प्रस्तुत नहीं किया था।
हाई कोर्ट ने समिति के दोबारा जांच करने के अधिकार पर उठाई गई आपत्ति खारिज कर दी, लेकिन सुनवाई की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं।
कोर्ट ने कहा कि जिन गवाहों के बयान के आधार पर प्रमाणपत्र रद किया गया, उनसे जिरह का अवसर नहीं दिया गया। बिना जिरह के ऐसे बयानों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। केवल वर्ष 1950 से पहले के दस्तावेज पेश नहीं कर पाने को भी दावा खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। समिति को उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय जांच, मौखिक साक्ष्य और अन्य प्रासंगिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन करना होगा।
कोर्ट ने प्रमाणपत्र निरस्त करने का आदेश रद्द कर मामला फिर समिति को सौंप दिया। समिति को जांच रिपोर्ट और सतर्कता प्रकोष्ठ की रिपोर्ट की प्रतियां देने, सभी प्रतिकूल गवाहों से जिरह का अवसर उपलब्ध कराने तथा मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य लेने के बाद नया कारणयुक्त आदेश पारित करने कहा है। यह प्रक्रिया आदेश मिलने के 90 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया है।