
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाथ में कानूनी नोटिस की प्रति, आंखों में बेबसी और चेहरे पर परिवार के निवाले की चिंता लिए दो दर्जन से अधिक ई-रिक्शा चालक कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो डिजिटल इंडिया के चमकते दावों के पीछे का काले सच का पर्दाफांस हो गया। मल्टी-नेशनल एप रैपिडो की मनमानी नीतियों ने शहर के सैकड़ों ई-रिक्शा चालकों को कर्ज और आर्थिक तंगी की कगार पर ला खड़ा किया है।
बैटरी चार्जिंग का बढ़ता खर्च, सड़कों के गड्ढे और दिनभर का पसीना बहाना, इतनी जद्दोजहद के बाद भी ई-रिक्शा चालकों के हाथ खाली हैं। चालकों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि किसी सवारी के एक गलत क्लिक या झूठी शिकायत पर एप बिना किसी जांच के उनकी आईडी तुरंत लाक कर देता है। रोजी-रोटी का जरिया छिनते ही चालक दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर होते हैं, जहां उसे दोबारा चालू करने के नाम पर 400 से 500 रुपये की सीधी अवैध वसूली की जाती है।
संघ अध्यक्ष इमरान अली के नेतृत्व में पहुंचे चालकों ने बताया कि जब कंपनी के स्थानीय प्रबंधक को विधिक नोटिस भेजा गया, तो उन्होंने बात सुनने तक की तकलीफ भी नहीं उठाई। ई-रिक्शा को सामान्य आटो की श्रेणी में डालकर कम दरें थोप दी गई हैं, जिससे गाड़ी की किस्त चुकाना तक नामुमकिन हो रहा है। कई बार यात्री दूर ले जाकर मना कर देते हैं या ट्रिप रद्द कर देते हैं, जिसका पूरा नुकसान केवल चालक की जेब पर पड़ता है।
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ई रिक्शा संघ का कहना है कि एक आवेदन नहीं बल्कि कार्पोरेट एप्स के एल्गोरिदम में पिसते उस असंगठित मजदूर वर्ग की चीख है, जो दिनभर धूप-बारिश में पहिया घुमाकर भी शाम को बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा है।
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कलेक्ट्रेट पहुंचीं महिला ई-रिक्शा चालकों का दर्द सुनकर भी भयावह था। स्वाभिमान से जीने के लिए कर्ज लेकर रिक्शा खरीदा था, लेकिन कंपनी के शोषण ने कमर तोड़ दी। कभी भी आईडी बंद कर दी जाती है और फिर पैसे की मांग होती है। पूरे दिन की मेहनत के बाद भी हाथ में कुछ नहीं बचता, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।
मनमानी कटौती और ओवरलोडिंग के दबाव से जोखिम में जान
सवारी कई बार ई-रिक्शा में भारी माल या क्षमता से अधिक सामान लादने का दबाव बनाती है। मना करने पर रेटिंग गिराने या शिकायत की धमकी मिलती है। तय स्थान से आगे जाने पर भी अतिरिक्त दूरी का किराया एप में नहीं जुड़ता। बिना किसी मानवीय संवाद के सिर्फ एप के भरोसे चालकों की किस्मत का फैसला हो रहा है।