
नईदुनिया प्रतिनिधि, कोरबा : सरकारी पैसा है, खाते में रखना अपराध है, फंस जाओगे, पैसा वापस निकालकर दे दो। तिलकेजा ग्राम पंचायत में प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि के कथित खेल में ग्रामीणों को डराकर उनके खातों से रकम निकलवाने का मामला सामने आया है। सरकारी राशि पहले दूसरों के खातों में पहुंची और फिर डर का माहौल बनाकर वापस निकलवा ली गई।
मामला यहीं नहीं रुका, घोटाले से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज पंचायत कार्यालय से गायब कर दिए गए। मृतकों के नाम पर आवास की राशि जारी होने से लेकर निर्माण और भुगतान की प्रक्रिया पूरी दिखाए जाने तक की गड़बड़ियां जांच में सामने आ चुकी हैं। पूरे खेल में सरपंच, सचिव, आवास मित्र, ब्लाक संयोजक और कंप्यूटर आपरेटर की भूमिका जांच के घेरे में है।
घोटालेबाजों ने गांव के ही लोगों के बैंक खाते में फर्जी हितग्राहियों की पहली किस्त की 40-40 हजार रुपये की राशि डाली। पहले से इन ग्रामीणों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। सरपंच और सचिव इन ग्रामीणों के पास पहुंचे और कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि आपके बैंक खाते में पहुंच गई है। इसके बाद संबंधित खाताधारकों को डराया गया कि सरकारी पैसा उनके खाते में गलती से आया है और इसे रखने पर कार्रवाई हो सकती है। इसी डर का फायदा उठाकर खातों से रकम निकलवाई गई।
सरकारी राशि किसके नाम पर स्वीकृत हुई, किस खाते में पहुंची, किसने रकम निकलवाई और निकाली गई राशि आखिर किसके पास गई, इन सभी कड़ियों की जानकारी बैंक अभिलेखों से सामने आ सकती है। यदि खातों की निकासी और राशि वापस लेने वाले लोगों की पहचान एक साथ सामने आती है तो घोटाले में शामिल लोगों तक पहुंचना मुश्किल नहीं होगा।\
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प्रधानमंत्री आवास से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज पंचायत कार्यालय से गायब होने की बात सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया है। दस्तावेजों के गायब होने से साफ है कि कागजी प्रमाणों को जांच से दूर रखने की कोशिश हुई है। लेकिन अब आनलाइन दर्ज जानकारी, आवास की तस्वीरें, जियो-टैगिंग, भुगतान विवरण और बैंक खातों का अभिलेख इस पूरे खेल की परतें खोल सकता है।
जांच का सबसे अहम बिंदु यह है कि जिन मृत व्यक्तियों के नाम पर राशि जारी हुई, उनके आवास का निर्माण किसने और कब कराया। प्लिंथ स्तर की तस्वीर किस स्थान की अपलोड हुई। जियो-टैगिंग किसने की और भुगतान के लिए सत्यापन किस स्तर से स्वीकृत हुआ। इन सवालों के जवाब सामने आते ही जिम्मेदारों की भूमिका स्पष्ट हो जाएगी।
हर चरण पर सत्यापन जरूरी, फिर भी कर गए गड़बड़ी
प्रधानमंत्री आवास योजना में पात्र हितग्राही को एक लाख 20 हजार रुपये तीन किश्तों में दिए जाते हैं। पहली किश्त 40 हजार रुपये की होती है। इसके बाद आवास निर्माण की प्रगति के आधार पर अगली किश्त जारी होती है। निर्माण की स्थिति का सत्यापन, तस्वीर और आनलाइन जानकारी दर्ज होने के बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यही व्यवस्था अब घोटाले की जांच का सबसे बड़ा आधार बन सकती है। जब निर्माण हुआ ही नहीं या हितग्राही की मृत्यु हो चुकी थी तो आवास की प्रगति किसने दर्ज की। तस्वीर किसकी थी और सत्यापन किसने किया। आनलाइन प्रक्रिया में किस कर्मचारी की लागिन से जानकारी दर्ज हुई। इन सभी बिंदुओं की जांच से यह पता चलेगा कि कागज और जमीन की हकीकत के बीच कितना बड़ा खेल किया गया।
मनरेगा मजदूरी में भी खुल सकता है फर्जीवाड़ा
प्रधानमंत्री आवास निर्माण से जुड़े श्रमिकों को मनरेगा के तहत मजदूरी दिए जाने का प्रविधान है। ऐसे में जिन आवासों के नाम पर भुगतान हुआ, वहां दर्ज मजदूरों और कार्य दिवसों का मिलान भी जरूरी है। यदि मृत हितग्राहियों के नाम पर आवास निर्माण के साथ मजदूरी भुगतान भी दर्ज है तो यह घोटाले की एक और मजबूत कड़ी सामने ला सकता है।
नोटिस के बाद भी जांच में नहीं पहुंचे सरपंच-सचिव
जांच टीम ने सरपंच और पंचायत सचिव को नोटिस जारी कर हितग्राहियों के आधार कार्ड, बैंक पासबुक का प्रथम पृष्ठ और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए जाने वाला रजिस्टर लेकर 13 अगस्त को उप संचालक पंचायत कार्यालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद निर्धारित तिथि पर सरपंच और सचिव दोनों अनुपस्थित रहे।
इसके बाद 18 अगस्त को पंचायत सचिव नविता दुबे को अलग से नोटिस जारी कर तीन दिन के भीतर अनुपस्थिति और जांच से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने के संबंध में जवाब मांगा गया था। निर्धारित समय बीतने के बाद भी सचिव ने कोई जवाब नहीं दिया। इससे जांच में सहयोग को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।