
कमलेश रजक, नईदुनिया, बिलासपुर। पति-पत्नी के बीच संपत्ति की वापसी से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि प्रकरण कुटुंब न्यायालय अधिनियम के तहत वैवाहिक संपत्ति से संबंधित कार्यवाही के दायरे में आता है, तो केवल बड़ी राशि का दावा करने के आधार पर उस पर आनुपातिक न्याय शुल्क नहीं लगाया जा सकता।
न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने रायपुर निवासी राहुल गुप्ता की याचिका स्वीकार करते हुए ढाई करोड़ रुपये से अधिक की वसूली के दावे पर न्याय शुल्क जमा करने का आदेश निरस्त कर दिया। ऐसे मामले में छत्तीसगढ़ में लागू प्रावधान के अनुसार 40 रुपये का निश्चित न्याय शुल्क देय होगा। राहुल गुप्ता ने कुटुंब न्यायालय, रायपुर में पत्नी राधिका गुप्ता उर्फ रेनू मित्तल से ढाई करोड़ रुपये वापस दिलाने के लिए आवेदन दिया था।
उनका दावा था कि विवाह के दौरान अपनी मेहनत की कमाई पत्नी के बैंक खातों में पारिवारिक विश्वास के आधार पर जमा की थी। उनके अनुसार पत्नी की स्वतंत्र आय नहीं थी और संबंधित राशि उनकी अपनी कमाई थी। उन्होंने ब्याज और हर्जाने की मांग भी की थी। कुटुंब न्यायालय ने 11 मार्च 2026 को दावा की गई राशि के आधार पर प्रकरण का मूल्यांकन कर आनुपातिक न्याय शुल्क जमा करने के निर्देश दिए थे। इसे राहुल गुप्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वैवाहिक संबंध के दौरान पति-पत्नी की संपत्ति की वापसी से जुड़ा विवाद कुटुंब न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने हाई कोर्ट की खंडपीठ के देविका जोशी बनाम दीपक जोशी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही में संपत्ति के मूल्य के अनुपात में न्याय शुल्क नहीं लगाया जा सकता।
हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में न्याय शुल्क का निर्धारण करते समय संबंधित फैसले और वैवाहिक संपत्ति संबंधी कानूनी प्रावधानों पर विचार करना जरूरी था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी के खाते में जमा रकम की वास्तविक प्रकृति और उसे वापस पाने के दावे की वैधता का फैसला अभी नहीं हुआ है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय का आदेश निरस्त करते हुए कहा कि यदि कार्यवाही वैवाहिक संपत्ति से संबंधित प्रकरण के दायरे में आती है, तो याचिकाकर्ता को दावा की गई राशि पर आनुपातिक न्याय शुल्क नहीं देना होगा। उसे निर्धारित 40 रुपये का निश्चित न्याय शुल्क ही देना होगा।
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कुटुंब न्यायालय को मामले की सुनवाई कानून के अनुसार आगे बढ़ाने और दावे के गुण-दोष पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश से पत्नी से मांगी गई राशि वापस पाने का दावा अपने आप सिद्ध नहीं माना जाएगा।
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