आदिवासी पति और अनुसूचित जाति की पत्नी के तलाक का मामला, हाई कोर्ट बोला-आदिवासी भी हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद करते हुए आदिवासियों को भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत बताया है। ...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 08 Mar 2026 01:20:29 PM (IST)Updated Date: Sun, 08 Mar 2026 01:39:29 PM (IST)
HighLights
- अधिनियम के प्रविधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता
- सहमति से तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी
- इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद करते हुए आदिवासियों को भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत बताया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्यों को इस अधिनियम के प्रविधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक आदिवासी पति और उसकी अनुसूचित जाति की पत्नी की आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की याचिका खारिज कर दी गई थी।
तलाक की याचिका दायर की थी
दंपती ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत जगदलपुर स्थित पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। उनकी शादी हुए लगभग 20 वर्ष हो चुके हैं।
फैमिली कोर्ट ने ये सुनाया था फैसला
जगदलपुर परिवार न्यायालय ने 12 अगस्त 2022 को अधिनियम की धारा- दो का हवाला देते हुए दंपती के आवेदन को खारिज कर दिया था। इसमें कहा गया था कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, जब तक कि केंद्र द्वारा कोई अधिसूचना जारी न की जाए। इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
जानिए पूरा मामला
बस्तर जिला निवासी अपीलकर्ता अनुसूचित जनजाति से है, जबकि पत्नी अनुसूचित जाति से। इनकी शादी 15 अप्रैल 2009 को हुई थी। 28 दिसंबर 2011 को उन्हें एक बेटा हुआ, जो पत्नी के साथ रह रहा है। अपीलकर्ता छह अप्रैल 2014 से पति-पत्नी अलग रहने लगा। दोनों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।