
अनिमेष पाल, नईदुनिया जगदलपुर। गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब देश संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात करता है, तब बस्तर की धरती एक अलग ही गणतंत्र कथा कहती है। यहां सुरक्षा बल सिर्फ वर्दीधारी जवान नहीं रहे, बल्कि गणतंत्र के असली गण बनकर उभरे।
माओवाद के विरुद्ध यह लड़ाई कोई एक-दो साल की नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय से चली आ रही है। छत्तीसगढ़ के गठन (वर्ष 2000) के बाद यह संघर्ष और तीखा हुआ।
आंकड़े इसकी भयावहता को बयान करते हैं कि 2001 से 21 दिसंबर 2025 तक 3414 मुठभेड़ें हुईं। 1,573 माओवादी मारे गए, 1318 सुरक्षा बलों के जवान बलिदान हुए और 1821 निर्दोष नागरिक माओवादी हिंसा का शिकार बने।
ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की कीमत हैं। शुरुआती दौर आसान नहीं था। नागा बटालियन और सीआरपीएफ की तैनाती के बावजूद सुरक्षा बल गुरिल्ला युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर माओवादियों ने बारूदी सुरंग और आइईडी को हथियार बनाया।
ताड़मेटला में 76, बुर्कापाल में 25 जवानों का बलिदान और रानीबोदली में 53 जवानों को आग में झोंकने जैसी घटनाएं बस्तर के इतिहास पर गहरे घाव छोड़ गईं। 2005 में सलवा जुड़ूम के दौर में हिंसा अपने चरम पर पहुंची।
आदिवासी समाज दो धड़ों में बंटा। एक ओर माओवादी बंदूक के साथ, दूसरी ओर डंडा थामे आम ग्रामीण। माओवादियों ने जनअदालतों के नाम पर शिक्षक, सरपंच, सचिव, महिलाएं और बच्चों तक की हत्याएं की। यह दौर गणतंत्र के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी।
इतिहास वहीं मुड़ता है, जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत संकल्प साथ आते हैं। 2021 में टेकुलगुड़ेम हमले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवाद के समूल खात्मे का लक्ष्य तय किया। मार्च 2026 की समयसीमा के साथ। पिछले चार वर्षों में बस्तर संभाग में लगभग 135 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। सुरक्षा बल पहली बार माओवादियों के कोर एरिया में स्थायी रूप से उतरे।
जिन इलाकों में कभी माओवादी कदमों की आहट से डर लगता था, वहां आज जवानों की गश्त भरोसे का संदेश देती है। 3,412 हथियार और 4,367 आइईडी जब्त किए गए। वर्ष 2025 इस लड़ाई का निर्णायक अध्याय बना। माओवादी महासचिव बसवा राजू सहित 11 केंद्रीय समिति सदस्य मारे गए।
थेंटू लक्ष्मी उर्फ नरसिम्हा चालम, के. रामचंद्र रेड्डी, कोसा और माड़वी हिड़मा जैसे शीर्ष नाम इतिहास बन गए। एक साल में 256 शीर्ष माओवादी मारे गए, यह अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा। साथ ही 884 गिरफ्तार हुए और 1562 ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की।
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स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य और राशन जैसी सुविधाएं उन गांवों तक पहुंची हैं, जहां कभी सिर्फ डर का राज था। जो ग्रामीण कभी माओवादियों पर भरोसा करते थे, आज वे संविधान और सुरक्षा बलों पर विश्वास जता रहे हैं। अब सुरक्षा बल तंत्र के सिपाही नहीं, बल्कि वास्तविक में तंत्र के गण बने हैं। बंदूक हार रही है और लोकतंत्र जीत रहा है।