
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर में हालिया बाढ़ के बाद विकास से जुड़े दो बड़े प्रोजेक्ट राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना और आंध्र प्रदेश की पोलावरम परियोजना को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा बस्तर के पानी को बस्तर के खेतों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर दे रही है, जबकि कांग्रेस पोलावरम के बैकवाटर से कोंटा क्षेत्र में संभावित डूबान और विस्थापन को बड़ा मुद्दा बना रही है।
जगदलपुर में प्रेसवार्ता के दौरान उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बोधघाट परियोजना को लेकर सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि बोधघाट बांध किसी भी क्षेत्र और किसी भी समुदाय पर थोपा नहीं जाएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रभावित लोगों की सहमति और सभी पक्षों से संवाद के बाद ही परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा। उनका तर्क है कि इंद्रावती नदी का पानी बस्तर से होकर गोदावरी में चला जाता है, जबकि नदी के आसपास के बड़े हिस्से में खेती आज भी मानसून पर निर्भर है।
यहीं से बोधघाट का राजनीतिक विमर्श शुरू होता है। करीब 29 हजार करोड़ रुपये की प्रस्तावित परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा के 269 गांवों को लाभ मिलने का दावा है। करीब 3.78 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, 125 मेगावाट बिजली उत्पादन और पेयजल उपलब्धता जैसी संभावनाओं को सरकार इसके पक्ष में रख रही है। भाजपा के लिए यह परियोजना बस्तर के विकास और सिंचाई क्षमता बढ़ाने का बड़ा माध्यम है। लेकिन डूबान, विस्थापन और प्रभावित परिवारों की सहमति का सवाल इसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा भी बनाता है।
कांग्रेस इसी संवेदनशीलता को अपनी राजनीति का आधार बना रही है। सुकमा के कोंटा में पोलावरम के बैकवाटर के संभावित प्रभाव को लेकर आदिवासी कांग्रेस ने विरोध रैली निकाली और राज्यपाल के नाम सात सूत्रीय ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस नेताओं ने मांग की कि डूब क्षेत्र का पारदर्शी सर्वे कराया जाए, विस्थापन से पहले पुनर्वास सुनिश्चित हो और प्रभावित परिवारों को जमीन के बदले कृषि भूमि उपलब्ध कराई जाए।
कांग्रेस का तर्क है कि विकास की कीमत आदिवासी समाज को विस्थापन के रूप में नहीं चुकानी चाहिए। दोरला जनजाति और उनके पारंपरिक जल, जंगल जमीन के अधिकारों का सवाल उठाकर पार्टी सरकार पर दबाव बढ़ाना चाहती है। संभावित बैकवाटर को लेकर तकनीकी सर्वे और प्रभावित गांवों की संख्या का मुद्दा भी राजनीतिक बहस को और धार दे रहा है।
दिलचस्प यह है कि दोनों दल बस्तर के विकास की भाषा बोल रहे हैं, लेकिन प्राथमिकताएं अलग हैं। भाजपा के सामने सवाल है कि बस्तर में उपलब्ध जल संसाधनों का इस्तेमाल कर कृषि और विकास को कैसे गति दी जाए। कांग्रेस का जोर इस बात पर है कि विकास परियोजनाओं में आदिवासी हित और विस्थापन का सवाल सबसे ऊपर रखा जाए।
बाढ़ के बाद इन दोनों मुद्दों का एक साथ उभरना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। भाजपा बोधघाट के जरिए बस्तर को सिंचाई और विकास का भरोसा दे रही है, तो कांग्रेस पोलावरम के जरिए संभावित डूबान और विस्थापन का मुद्दा उठा रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में बस्तर की राजनीति पानी, परियोजना और पुनर्वास के सवालों के इर्द गिर्द और तेज होने की संभावना है।