
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। दुबली-पतली कद काठी के 83 वर्षीय बुजुर्ग प्रधान अध्यापक के पद से सेवानिवृत्त शहर के ज्ञानदत्त मिश्र का शासकीय सेवाकाल संघर्ष में बीता है। उन्होंने अफसरों के गलत कामों का विरोध किया, शासन के निर्णयों पर भी कुछ अवसरों पर आपत्ति जताई।
इसका परिणाम यह हुआ कि 43 साल की सेवा के दौरान 20 बार उनका स्थानांतरण एक स्कूल से दूसरे स्कूल में किया जाता रहा। वर्ष 2003 में सेवानिवृत्त होने के बाद जब पेंशन एरियर भुगतान में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो छह साल पहले ज्ञानदत्त मिश्र ने सरकार के विरुद्ध बिलासपुर हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया।
हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने ज्ञानदत्त मिश्रा की याचिका का निराकरण करते हुए एक जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 तक के 32 महीने के पेंशन एरियर का भुगतान 120 दिनों के भीतर करने का निर्देश राज्य शासन को दिया है।
अदालत ने एक जनवरी 2006 से पहले सेवानिवृत्त पेंशनरों को वास्तविक वित्तीय लाभ एक सितंबर 2008 से देने संबंधी शासन के परिपत्र और स्पष्टीकरणों को भेदभावपूर्ण मानते हुए उस सीमा तक निरस्त कर दिया है। ज्ञानदत्त मिश्र शहर के वृंदावन कॉलोनी में रहते हैं और इन दिनों में उत्तर प्रदेश गए हुए हैं।
नईदुनिया ने फोन पर ज्ञानदत्त मिश्र से संपर्क कर हाई कोर्ट में उनकी जीत पर चर्चा शुरू की तो धीरे-धीरे खुलते चले गए। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’ सुनाते हुए कहा कि यह पंक्तियां संघर्ष, जिद और सकारात्मक सोच का हौसला देती हैं।
जब-जब मुश्किल दौर आया वे संघर्षों से राह निकालकर आगे बढ़ते रहे और सफलता भी मिलती गई। पेंशन एरियर के लिए कानूनी लड़ाई में मिली जीत को भी वह इसी बात से जोड़ने में देरी नहीं करते।
ज्ञानदत्त मिश्र का कहना था कि आज के समय में न्यायपालिका ही है जिस पर लोगों का विश्वास और भरोसा है। सरकारी नौकरी में आने के बाद से लेकर आज तक शासन-प्रशासन के निर्णयों के विरुद्ध आठ मुकदमे वह लड़ चुके हैं। इनमें एक में ही हार मिली बाकी सभी में उनकी जीत हुई। उनका कहना है कि वह निराश होने वालों में नहीं है और अन्याय सहने की आदत नहीं है। हाई कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक है। इसके आधार पर सैकड़ों पेंशनरों को लाभ मिलने की उम्मीद जागी है।
ज्ञानदत्त मिश्र ने 1960 में सहायक शिक्षक के पद पर नौकरी शुरू की और 2003 तक शासकीय सेवाकाल में कर्मचारी संगठनों का नेतृत्व किया। सेवानिवृत्ति के बाद कुछ समय तक पेंशनर कल्याण संघ का भी नेतृत्व किया। उनका कहना है कि जब तक सांस रहेगी अन्याय होने की स्थिति में उनका विरोध जारी रहेगा।