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प्रधानमंत्री आवास योजना में चौंकाने वाला खेल, कोरबा में अधूरे मकान को पूर्ण दिखाकर डकारे गए सरकारी रुपये

कोरबा जिले के करतला विकासखंड में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। यहां अपात्रों के चयन से लेकर फर्जी जियो टैगिंग के जरिए अ...और पढ़ें

By Pradeep BarmaiyaEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Thu, 27 Aug 2026 09:18:45 PM (IST)Updated Date: Thu, 27 Aug 2026 09:18:45 PM (IST)
प्रधानमंत्री आवास योजना में चौंकाने वाला खेल, कोरबा में अधूरे मकान को पूर्ण दिखाकर डकारे गए सरकारी रुपये
पीएम योजना के तहत बना मकान

HighLights

  1. करतला विकासखंड में पीएम आवास घोटाले का पर्दाफाश।
  2. जियो टैगिंग में मिलीभगत का सनसनीखेज मामला।
  3. जांच की मांग पर गरमाई सियासत।

नईदुनिया प्रतिनिधि,कोरबा: प्रधानमंत्री आवास योजना में फर्जी जियो टैगिंग के जरिए सरकारी राशि निकालने का खेल केवल अधूरे मकान को पूर्ण दिखाने तक सीमित नहीं है। करतला विकासखंड में सामने आए शिकायतों से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें गड़बड़ी की शुरुआत हितग्राही के चयन से ही हो रहा। इसके बाद उससे मिलीभगत कर किसी दूसरे पूर्ण मकान की तस्वीरें और जियो टैगिंग कर आवास को पूर्ण दर्शाया जाता है।

किस्त की राशि हितग्राही के खाते में पहुंचने के बाद उससे अपने हिस्से का रकम ले लिया जाता है। इस तरह योजना का लाभ वास्तविक जरूरतमंद के बजाय ऐसे व्यक्ति तक पहुंच जाता है, जिसे आवास की तत्काल आवश्यकता नहीं है या जिसके पास पहले से मकान मौजूद है।


ग्राम पंचायत गाड़ापाली में अनिल कुमार महंत पिता मदन दास महंत के नाम स्वीकृत आवास का मामला भी कुछ इसी तरह का है। अभिलेख के अनुसार 11 मार्च 2025 को प्रथम किस्त 40 हजार रुपये, 21 मई 2025 को द्वितीय किस्त 55 हजार रुपये और 23 जून 2026 को तृतीय किस्त 25 हजार रुपये हितग्राही के खाते में जमा की गई। सरकारी रिकार्ड में 10 मई 2026 को निर्माण कार्य पूर्ण दर्शाया गया है।

शिकायतकर्ताओं का दावा है कि मौके पर मकान अब भी अधूरा है और किसी अन्य पूर्ण मकान की तस्वीरों की जियो टैगिंग कर इसे पूर्ण बताया गया। इसी तरह ग्राम पंचायत कराईनारा के आश्रित ग्राम भेलवागुड़ी में गंगा राम पिता विशाल दास के नाम स्वीकृत आवास को लेकर भी शिकायत सामने आई है।

यह भी पढ़ें- सरकारी पैसा खाता में रखना अपराध है, डराकर पीएम आवास के नाम पर ठगी करने वाला बड़ा खेल बेनकाब

शिकायत के मुताबिक मकान अधूरा होने के बावजूद रिकार्ड में उसे पूर्ण दर्शाकर प्रथम किस्त 40 हजार, द्वितीय किस्त 55 हजार और तृतीय किस्त 25 हजार रुपये के साथ मनरेगा मजदूरी मद की राशि का भुगतान किया गया।

आरोप है कि दूसरे मकान की तस्वीरों का इस्तेमाल कर जियो टैगिंग की गई। योजना में गड़बड़ी का सबसे अहम पहलू हितग्राही चयन को माना जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार कई मामलों में व्यक्ति को वास्तव में आवास की आवश्यकता नहीं होने के बावजूद योजना का हितग्राही बनाया जाता है या वह केवल सरकारी योजना की राशि प्राप्त करने के उद्देश्य से हितग्राही बनने के लिए तैयार होता है।

कुछ मामलों में हितग्राही को आवास निर्माण से अधिक किसी दूसरे काम के लिए राशि की आवश्यकता होने की भी बात सामने आ रही है। ऐसे में योजना के वास्तविक उद्देश्य के बजाय राशि प्राप्त करना प्राथमिकता बन जाता है। इसके बाद पंचायत स्तर पर हितग्राही, आवास सहायक, रोजगार सहायक, पंचायत सचिव तथा संबंधित स्तर के कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से निर्माण की वास्तविक स्थिति के विपरीत जियो टैगिंग और प्रगति दर्ज किए जाने का आरोप है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि हितग्राही के खाते में किस्त की राशि पहुंचने के बाद तय हिस्से के रूप में रकम वापस लिए जाने का खेल भी चलता है। यदि यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो पूरी प्रक्रिया में केवल जियो टैगिंग ही नहीं, बल्कि हितग्राही चयन से लेकर भुगतान और राशि के कथित बंटवारे तक की जांच जरूरी होगी।

तीसरी किस्त तक चलता रहता है खेल

प्रधानमंत्री आवास की किस्तें निर्माण की प्रगति के आधार पर जारी की जाती हैं। ऐसे में यदि अधूरे मकान को प्रत्येक चरण में प्रगति के अनुरूप दिखाकर भुगतान कराया गया, तो सवाल केवल अंतिम जियो टैगिंग पर नहीं बल्कि प्रत्येक स्तर पर किए गए सत्यापन पर उठता है। पहली किस्त के बाद निर्माण की स्थिति, दूसरी किस्त के समय प्रगति और तीसरी किस्त से पहले पूर्णता की पुष्टि किसने की, इसकी जांच किए जाने पर पूरी गड़बड़ी सामने आ सकती है।

मौके पर मिलान से सामने आउगा फर्जीवाडा

ग्रामीणों का कहना है कि यदि केवल एक-दो आवासों की जांच करने के बजाय करतला विकासखंड में स्वीकृत आवासों की भौतिक जांच कराई जाए और जियो टैग की गई तस्वीरों का मौके के मकानों से मिलान किया जाए, तो कई और मामले सामने आ सकते हैं। उन्होंने हितग्राही चयन से लेकर अंतिम किस्त तक की प्रक्रिया की जांच, फर्जी जियो टैगिंग में शामिल लोगों की जिम्मेदारी तय करने, सरकारी राशि की वसूली और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग की है।

लगातार सामने आ रही शिकायतों ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि यदि किसी अन्य पूर्ण मकान की तस्वीर लगाकर अधूरे आवास को पूर्ण दिखाया जा सकता है और उसकी तीसरी किस्त तक जारी हो सकती है, तो योजना की जमीनी निगरानी आखिर किस स्तर पर हो रही है।