नईदुनिया न्यूज, नारायणपुर। जंगल के बीच खड़ा वह लकड़ी का स्मारक वर्षों तक सिर्फ एक ढांचा नहीं था, बल्कि माओवादियों के डर का प्रतीक था। उसके सामने से गुजरते समय ग्रामीण नजरें झुका लेते थे, धीमे कदमों से निकलते थे और मन में एक ही खौफ रहता था, कहीं किसी की नजर न पड़ जाए।
वही स्मारक मंगलवार को ग्रामीणों के हाथों ही जमीन पर बिखर गया। सुरक्षा बलों के जवान साथ खड़े थे, लेकिन सबसे बड़ा बदलाव यह था कि जिन लोगों ने कभी डर के कारण आवाज नहीं उठाई, वे अब खुद माओवादियों के प्रतीकों को मिटाने में आगे आ रहे हैं।
माओवादियों द्वारा निर्मित स्मारक ध्वस्त कर दिया गया
थाना धनोरा क्षेत्र के ग्राम तोयापारा में 28 जुलाई को छत्तीसगढ़ पुलिस और आइटीबीपी की 45वीं वाहिनी की संयुक्त टीम सर्च अभियान पर पहुंची थी। अभियान के दौरान स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से माओवादियों द्वारा निर्मित लकड़ी का स्मारक ध्वस्त कर दिया गया। पुलिस के अनुसार यह स्मारक माओवादी संगठन ने अपने प्रभाव और प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से बनाया था। अब उसी प्रतीक को गांव वालों ने सुरक्षा बलों के साथ मिलकर गिरा दिया।
स्कूल खोलने, आंगनबाड़ी और मोबाइल नेटवर्क की मांग
यह बदलाव केवल एक स्मारक के ढहने तक सीमित नहीं है। बस्तर के जिन गांवों में कभी माओवादियों का प्रभाव इतना गहरा था कि लोग सड़क, स्कूल, पुल-पुलिया या मोबाइल टावर की मांग तक करने से डरते थे, वहीं अब ग्रामीण खुलकर विकास की बात कर रहे हैं।
गांवों में सड़क पहुंचाने, पुल-पुलिया बनाने, स्कूल खोलने, आंगनबाड़ी चलाने और मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध कराने की मांग अब खुद ग्रामीण प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने रख रहे हैं। जो आवाज कभी बंदूक के डर से दब जाती थी, वही अब विकास की मांग बनकर सामने आ रही है।
एक ग्रामीण ने बताया कि पहले इस स्मारक को देखकर ही डर लगता था। लगता था कि यह उनकी ताकत की निशानी है। कोई कुछ बोलता नहीं था। अब हालात बदल गए हैं। हमने जवानों के साथ मिलकर इसे हटाया है। अब हमें गांव में सड़क चाहिए, स्कूल चाहिए, मोबाइल नेटवर्क चाहिए। डर नहीं, विकास चाहिए।
माओवादियों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव लगातार कमजोर पड़ रहा
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि माओवादी विरोधी अभियान अब केवल हथियारबंद कैडरों तक सीमित नहीं है। जिन प्रतीकों के सहारे संगठन ग्रामीणों के मन में भय बनाए रखता था, उन्हें भी हटाया जा रहा है। ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी इस बात का संकेत है कि जंगलों में विश्वास लौट रहा है और माओवादियों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव लगातार कमजोर पड़ रहा है।
तीन साल में सौ से अधिक माओवादी स्मारक ध्वस्त
माओवादियों के प्रभाव को खत्म करने की रणनीति के तहत पिछले तीन वर्षों में बस्तर संभाग में 100 से अधिक माओवादी स्मारक ध्वस्त किए जा चुके हैं। इनमें बीजापुर के कोमटपल्ली का करीब 64 फीट ऊंचा स्मारक सबसे चर्चित रहा। इसके अलावा दंतेवाड़ा के मालेवाही, पुसपाल और कचनार सहित कई गांवों में बनाए गए स्मारकों को भी सुरक्षा बलों ने ग्रामीणों के सहयोग से हटाया।
बड़ी संख्या में माओवादी स्मारकों को ध्वस्त किया गया
हाल के अभियानों में सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और बस्तर जिले के कई इलाकों में एक साथ बड़ी संख्या में माओवादी स्मारकों को ध्वस्त किया गया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ये स्मारक केवल यादगार नहीं, बल्कि माओवादी प्रभाव और भय के मनोवैज्ञानिक प्रतीक थे। इनके हटने के साथ गांवों में विकास और शासन के प्रति लोगों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।