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नारायणपुर में पुलिया बहने से तीन गांव कटे, फरियाद अनसुनी रही तो ग्रामीणों ने लकड़ी-रस्सियों से भारी पाइप उठाकर बनाई सड़क

नारायणपुर के तीन गांवों का रास्ता पुलिया बहने से बंद हो गया। प्रशासन से मदद नहीं मिलने पर ग्रामीणों ने श्रमदान कर ह्यूम पाइप रखकर आवागमन बहाल किया।

By Vinod SinghEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Wed, 09 Sep 2026 01:53:59 PM (IST)Updated Date: Wed, 09 Sep 2026 01:53:59 PM (IST)
नारायणपुर में पुलिया बहने से तीन गांव कटे, फरियाद अनसुनी रही तो ग्रामीणों ने लकड़ी-रस्सियों से भारी पाइप उठाकर बनाई सड़क
नारायणपुर में पुलिया बहने से तीन गांव कटे। (नईदुनिया)

HighLights

  1. बारिश में पुलिया बहने से तीन गांवों का संपर्क टूटा।
  2. झारावाही, हतलानार और दुम्मा गांव जिला मुख्यालय से कटे।
  3. ग्रामीणों ने प्रशासन को कई बार समस्या की जानकारी दी।

नईदुनिया प्रतिनिधि, नारायणपुर: बस्तर और अबूझमाड़ के सुदूर अंचलों में 'अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने' के प्रशासनिक दावे कागजों में सिमट कर रह गए हैं। नारायणपुर जिले के ग्राम पंचायत झारावाही से सामने आई तस्वीरें सिस्टम की संवेदनहीनता पर करारा तमाचा जड़ रही हैं। जब गुहार लगाने के बाद भी हुक्मरानों के कान पर जूं नहीं रेंगी, तो मजबूर ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर रास्ता दुरुस्त करने की ठान ली।

जिला मुख्यालय से कटा तीन गांवों का संपर्क

जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत झारावाही से हतलानार होते हुए नारायणपुर को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग हालिया बारिश में पुलिया बह जाने के कारण पूरी तरह जमींदोज हो गया था। इस आपदा के चलते झारावाही, हतलानार और दुम्मा गांव के लोगों का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह टूट गया। स्कूली बच्चे, बीमार बुजुर्ग और आपातकालीन स्थिति में मरीज गांव में ही कैद होकर रह गए थे।


दरवाजे खटखटाए, पर किसी ने नहीं सुनी फरियाद

ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि रास्ता टूटने और पुलिया बहने की सूचना जनपद पंचायत से लेकर जिला प्रशासन के उच्चाधिकारियों को दी गई थी। लगातार दफ्तरों के चक्कर काटने और सुनवाई की मिन्नतें करने के बाद भी किसी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर जाकर सुध लेना तक मुनासिब नहीं समझा। शासन-प्रशासन के इस उदासीन रवैये ने ग्रामीणों को यह अहसास करा दिया कि उन्हें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।

हौसले और लकड़ी के सहारे उठाया भारी ह्यूम पाइप

प्रशासन की बेरुखी से तंग आकर झारावाही, हतलानार और दुम्मा के ग्रामीण एकजुट हुए और खुद ही सड़क व पुलिया निर्माण में जुट गए। बिना किसी सरकारी मशीनरी, क्रेन या आधुनिक संसाधन के ग्रामीणों ने लकड़ी और रस्सियों के सहारे कई क्विंटल वजनी सीमेंट (ह्यूम) पाइप को अपने कंधों पर उठाया और बह चुके नाले पर रखकर आवागमन का रास्ता बनाया। यह दृश्य सरकारी अमले को आईना दिखाने के लिए काफी है कि जिस काम के लिए करोड़ों के बजट और टेंडर निकलते हैं, उसे बेबस ग्रामीणों को अपने पसीने से सींचना पड़ रहा है।

व्यवस्था पर खड़े होते तीखे सवाल

  • जब बारिश में मुख्य मार्ग कट चुका था, तब आपदा प्रबंधन और लोक निर्माण विभाग क्या कर रहा था?
  • बार-बार सूचना देने के बावजूद जनपद और जिला प्रशासन ने फौरी व्यवस्था क्यों नहीं की?
  • क्या अबूझमाड़ का विकास केवल मंचों से दिए जाने वाले भाषणों तक ही सीमित है?
  • ग्रामीणों द्वारा अपने स्तर पर बनाई गई इस कच्ची व्यवस्था के बाद क्या अब प्रशासन स्थायी पुलिया और पक्की

सड़क का निर्माण कराएगा?

ग्रामीणों की यह एकजुटता जहां अबूझमाड़ के लोगों के अदम्य साहस और जुझारूपन को बयां करती है, वहीं यह तस्वीर इस कड़वे सच को भी उजागर करती है कि सिस्टम की लापरवाही ने आज आम जनता को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए भी खुद मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया है।