
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया.रायपुर। खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और वहां के लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए 2015 में शुरू की गई 'प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना' (PMKKKY) छत्तीसगढ़ में अपनी राह से भटक गई है। भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने योजना के क्रियान्वयन में भारी अनियमितताओं और घोर लापरवाही की पोल खोल दी है। कागजों पर करोड़ों रुपये खर्च दिखा दिए गए, लेकिन हकीकत में बड़ी आबादी आज भी विकास से कोसों दूर है।
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के न्यासों ने 4,536.58 करोड़ की बड़ी राशि खर्च की है। जिन 11 जिलों की जांच की गई, उनमें प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित 1,734 गांवों में से 44 प्रतिशत यानी 754 गांव विकास कार्यों से पूरी तरह अछूते रह गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना किसी मास्टर प्लान या विजन डॉक्यूमेंट के मनमाने ढंग से धन खर्च करने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
लेखापरीक्षा में जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) के नियमों का सरेआम उल्लंघन पाया गया है। कई जिलों में बिना वार्षिक कार्ययोजना और बजट के ही निधि का बेतहाशा इस्तेमाल किया गया। केंद्र सरकार के आदेशों के विपरीत राज्य-स्तरीय डीएमएफ प्रकोष्ठ को ₹1.68 करोड़ हस्तांतरित किए गए और मार्च 2024 तक ₹10.82 करोड़ की राशि वहां बकाया पड़ी रही। प्रभावित लोगों के कल्याण के लिए निर्धारित ₹30.73 करोड़ का उपयोग सरकारी कार्यालयों के निर्माण और सौंदर्यीकरण में कर दिया गया।
योजना की निगरानी के अभाव में कला-संस्कृति केंद्र, बायोगैस संयंत्र, मुर्गी पालन जैसे कई प्रोजेक्ट्स अधूरे पड़े हैं, जो अब कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, गैर-योजनाबद्ध गतिविधियों में ₹41.80 करोड़ का ''निष्फल व्यय'' हुआ है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम, 2002 की अनदेखी करते हुए खरीददारी में ₹56 करोड़ से अधिक की गड़बड़ी की गई है। साथ ही, पारदर्शिता का दावा करने वाली वेबसाइटें भी खाली हैं और मानव संसाधन की कमी के कारण निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
योजना में पारदर्शिता का दावा करने वाली वेबसाइटें भी जानकारी के मामले में खाली पड़ी हैं। 12 जिलों की वेबसाइटों की समीक्षा में पाया गया कि वहां न तो कार्यों की स्थिति की जानकारी है और न ही बैठकों का ब्यौरा। सबसे गंभीर बात यह है कि मानव संसाधन की भारी कमी है। बेमेतरा और महासमुंद में 100 प्रतिशत पद खाली हैं, जबकि बलोद, बिलासपुर, रायगढ़ और राजनांदगांव में 50 प्रतिशत से अधिक महत्वपूर्ण पद रिक्त पड़े हैं, जिससे निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।