
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। छत्तीसगढ़ में राजनीति का गणित बहीखातों या विकास के विजन से नहीं, बल्कि गुरु और गोवंश के समीकरणों से तय होता दिख रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में नए-नए सियासी दांव चले जा रहे हैं, जिससे 2028 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछने लगी है।
चर्चा है कि भाजपा सरकार में मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई गुरु ढालदास साहेब ने घर वापसी करते हुए कांग्रेस का दामन थाम लिया है। चुनाव से पहले उनके भाई ने भाजपा का हाथ पकड़कर कमल खिलाया था और अब दूसरे भाई के कांग्रेस में आने से कांग्रेस को सत्ता की उम्मीद दिखने लगी है। यानी एक ही परिवार के दो भाई दो अलग-अलग दलों में हैं और दोनों तरफ से सतनाम समाज के वोट बैंक को साधने की कोशिश हो रही है।
दूसरी तरफ, नवा रायपुर के मंत्रियों के बंगलों के इर्द-गिर्द गोवंश को पीटते हुए एक वीडियो प्रसारित हो रहा है, जिसे कांग्रेस बड़े चाव से शेयर कर रही है। कांग्रेस इस वीडियो के जरिए सरकार को गौ-संरक्षण के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रही है। अब स्थिति यह है कि एक तरफ गुरुओं की कृपा से अगले चुनाव 2028 की सियासी वैतरणी पार करने की जुगाड़ चल रही है, तो दूसरी तरफ गोवंश के वीडियो से भी सत्तापक्ष को चुनौती दी जा रही है। ऐसे में सत्तापक्ष को सतर्क रहने की जरूरत है।
राजनीति के उर्वर खेतों में मक्के के हाइब्रिड बीजों का अनोखा खेल चर्चा में है। चर्चा यह है कि गुजरात के आधार कार्ड वाले एक खास शख्स को मक्के के बीजों का 15 करोड़ रुपये का ठेका देने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इसके लिए दिल्ली के किसी विशेष दरबार से खास फंड मंगाए जाने की भी अफवाहें गर्म हैं।
चर्चा यह भी है कि जिन लोगों की तलाश में सीबीआई और ईडी की टीमें देश के कोने-कोने में छापे मार रही हैं, वे मंत्रालय और संचालनालय के वातानुकूलित कमरों में देखे जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि यह हल्दी के बीजों में पहले खेले गए खेल का नया और उन्नत अवतार है। फाइलों के इन हाइब्रिड खेतों में भ्रष्टाचार की फसल इतनी तेजी से उगती है कि आम जनता देखती रह जाती है।
आम जनता रोजगार, बिजली-पानी जैसी बुनियादी समस्याओं के समाधान और आधुनिक विकास की उम्मीद में है। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में समय के पहिए को पीछे घुमाने की होड़ चल रही है। कुछ नेताओं पर अचानक अस्सी के दशक के दौर में लौटने का जुनून सवार दिख रहा है।
उनकी राजनीति की शैली वीसीआर, टेलीफोन के घुमावदार डायल और पुराने नारों जैसी लग रही है। ऐसा लगता है कि वे इक्कीसवीं सदी की डिजिटल क्रांति से आंखें मूंद चुके हैं। जनता जब भविष्य के स्मार्ट शहरों का सपना देखती है, तो नेताजी उन्हें दूरदर्शन के पुराने दिनों और लाउडस्पीकर वाले भाषणों की याद दिला रहे हैं। वर्तमान के पन्नों पर भविष्य लिखने के बजाय, वे अतीत के घिसे-पिटे अध्यायों को ही दोबारा रंगने में लगे हैं।
कांग्रेस पार्टी का चुनावी प्रबंधन इस समय शोध का विषय बना हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में जनता द्वारा नकार दिए गए दिग्गजों को अब पार्टी ने पंद्रह नगरीय निकायों की जिम्मेदारी सौंपी है। जो नेता खुद अपनी विधानसभा नहीं बचा पाए, उन्हें अब नगर निगमों की किलेबंदी का सेनापति बना दिया गया है।
बीरगांव में शिवकुमार डहरिया, भिलाई में धनेंद्र साहू और रिसाली में मोहन मरकाम जैसे पूर्व मंत्रियों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। पूर्व विधायक विकास उपाध्याय पर भी कांग्रेस ने दांव खेला है। इस प्रयोग पर सत्तापक्ष में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस के तरकश में अब सिर्फ पराजित तीर ही बचे हैं। कहा जा रहा है कि जिस पार्टी के सेनापति खुद अपनी सीट नहीं बचा सके, वे नगरीय निकाय चुनाव में क्या कर पाएंगे।