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छत्तीसगढ़ में 43 जनजातियों का वास: कुल आबादी के 31 प्रतिशत से ज्यादा हैं आदिवासी

छत्तीसगढ़ में निवास करने वाली तैंतालीस जनजातियों के बच्चों और किशोर-किशोरियों के समग्र विकास के लिए राजधानी रायपुर में दो दिवसीय ‘मूल मंथन’ कार्यशाला ...और पढ़ें

By Abhishek RaiEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 01:16:57 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 01:18:43 PM (IST)
छत्तीसगढ़ में 43 जनजातियों का वास: कुल आबादी के 31 प्रतिशत से ज्यादा हैं आदिवासी
दीप प्रज्ज्वलित करते आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा। इस दौरान मौजूद अन्य लोग। डीपीआर

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ में 43 जनजातियों का है वास
  2. आदिम जाति विकास विभाग की कार्यशाला
  3. आधुनिक दौर में संस्कृति बचाना बड़ी चुनौती

राज्य ब्यूरो, रायपुर। छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध संस्कृति, घने जंगलों और प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ अपनी विशिष्ट विविधता के लिए पूरे देश में एक अलग पहचान रखता है। राज्य में कुल 43 जनजातियां और उनकी अनेक उप-जनजातियां निवास करती हैं, जो प्रदेश की कुल आबादी का 31 प्रतिशत से अधिक हैं। इन तमाम जनजातियों के बच्चों, किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और एक सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राजधानी रायपुर में दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

राज्य शासन के आदिम जाति विकास विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य विषय ‘मूल मंथन आदिवासी ज्ञान से किशोरावस्था की पुनर्कल्पना’ रखा गया था। इस दो दिवसीय मंथन में देश-प्रदेश के तमाम विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने खुलकर हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच इन समुदायों की प्राचीन संस्कृति, परंपराओं और मौलिक मूल्यों को सुरक्षित रखना आज के समय की सबसे बड़ी और अहम चुनौती है।


संस्कृति और परंपराओं को बचाना सबसे बड़ी चुनौती

आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश में 43 जनजातियों का वास है और इनका संपूर्ण जीवन जल, जंगल तथा जमीन से गहराई से जुड़ा हुआ है। ये समुदाय प्रकृति को ही अपनी लौकिक और अलौकिक शक्ति मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसे में तेजी से बदलती आधुनिक दुनिया के बीच इन अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों और जीवन मूल्यों को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है, जिस पर गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है।

सामुदायिक नेतृत्व और विश्वास से होगा स्थायी परिवर्तन

कार्यशाला के अंतिम दिन वक्ताओं ने एक स्वर में सहमति जताई कि यदि जनजातीय क्षेत्रों में स्थायी परिवर्तन लाना है, तो स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखते हुए सामुदायिक नेतृत्व को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना होगा। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि जनजातीय समुदायों के साथ पूर्ण सम्मान, संवेदनशीलता और आपसी विश्वास के आधार पर जुड़ना ही किसी भी प्रभावी नीति की सफलता का असली आधार है।

बस्तर में शिक्षा की पहुंच लगातार बढ़ रही है

प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने अंत में कहा कि बस्तर सहित प्रदेश के सभी जनजातीय अंचलों में शिक्षा और बुनियादी सेवाओं की पहुंच लगातार तेजी से बढ़ रही है। इस दो दिवसीय ‘मूल मंथन’ के दौरान जो भी बहुमूल्य सुझाव और तथ्य सामने आए हैं, उन्हीं के आधार पर आने वाले समय में जनजातियों के उत्थान के लिए नई योजनाओं का संचालन और प्रभावी क्रियान्वयन किया जाएगा।