
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया. रायपुर। प्रदेश के गांवों की संस्कृति, जनजातीय परंपरा, प्राकृतिक खूबसूरती और स्थानीय जीवनशैली को पर्यटन के नक्शे पर नई पहचान दिलाने के लिए राज्य सरकार ने ‘चेंदरू राज्य ग्रामीण पर्यटन पुरस्कार’ शुरू किया है। ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले व्यक्ति या संस्था को हर वर्ष एक लाख रुपये नकद और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि पर्यटन का लाभ केवल प्रमुख पर्यटन स्थलों तक सीमित न रहकर दूरस्थ ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचना चाहिए। ग्रामीण पर्यटन के जरिए स्थानीय युवाओं, महिलाओं, स्व-सहायता समूहों, कारीगरों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए रोजगार व स्वरोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। पुरस्कार का उद्देश्य ऐसे जमीनी प्रयासों को पहचान देना है, जो पर्यटन के माध्यम से गांवों की तस्वीर बदल रहे हैं।
पुरस्कार के दायरे में सतत ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे, स्थानीय व्यंजन, हस्तशिल्प, लोककला, लोकसंस्कृति व प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण जैसे काम शामिल होंगे। समुदाय की भागीदारी, रोजगार सृजन और पर्यटन गतिविधियों से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को भी चयन में महत्व दिया जाएगा। किसी व्यक्ति को यह पुरस्कार जीवनकाल में केवल एक बार मिलेगा।
प्रविष्टियों के मूल्यांकन के लिए छह सदस्यीय निर्णायक मंडल बनाया जाएगा। इसकी अध्यक्षता छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के प्रबंध संचालक करेंगे। पर्यटन क्षेत्र के विशेषज्ञ और संबंधित अधिकारी भी जूरी में शामिल होंगे। टूरिज्म बोर्ड प्रमुख समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी कर प्रविष्टियां आमंत्रित करेगा। आवेदकों को प्रोफाइल, फोटो, स्थानीय निवासी प्रमाण-पत्र, आधार कार्ड और अपने कार्यों व उपलब्धियों से जुड़े दस्तावेज देने होंगे।
चयनित विजेता या संस्था के प्रतिनिधि को राज्योत्सव में सम्मानित किया जाएगा। साथ ही उनके कार्यों और उपलब्धियों पर आधारित सचित्र स्मारिका जारी होगी। पुरस्कार का नाम बस्तर के प्रसिद्ध ‘चेंदरू’ से जुड़ा है, जिसने प्रदेश के प्राकृतिक और जनजातीय जीवन को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी। सरकार का मानना है कि पुरस्कार के माध्यम से गांवों की कला, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करते हुए पर्यटन से स्थानीय आय और रोजगार के नए अवसर बढ़ाए जा सकेंगे।
चेंदरू मंडावी बस्तर के एक मूरिया आदिवासी थे, जिन्हें भारत का असली मोगली और द टाइगर बॉय कहा जाता है। 1950 के दशक में एक आदमखोर माने जाने वाले बाघ के साथ उनकी स्वाभाविक और अटूट दोस्ती ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया था।
चेंदरू का जन्म बस्तर (वर्तमान नारायणपुर जिला) के गढ़बेंगाल गांव में आदिवासी परिवार में हुआ था। बचपन में चेंदरू के दादा को जंगल में लावारिस हालत में एक बाघ का नवजात शावक मिला, जिसे वे घर ले आए। चेंदरू ने उसका नाम टेम्बू रखा।
अटूट रिश्ता: चेंदरू और टेम्बू बिल्कुल सगे दोस्तों की तरह पले-बढ़े। वे एक ही थाली में खाना खाते, एक साथ नदी में तैरते और जंगल में घूमते थे।
सहज सह-अस्तित्व: बिना किसी प्रशिक्षण या सर्कस के, एक खूंखार वन्यजीव का किसी बच्चे के साथ इस तरह पूरी तरह घरेलू और सुरक्षित रूप से रहना मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे सामंजस्य का अनूठा उदाहरण बन गया।
1950 के दशक के मध्य में ऑस्कर विजेता स्वीडिश फिल्म निर्देशक आर्ने सक्सडॉर्फ (Arne Sucksdorff) बस्तर की जनजातीय संस्कृति और जंगलों पर शोध करने पहुंचे। जब उन्होंने चेंदरू और टेम्बू की दोस्ती देखी, तो वे अचंभित रह गए।
फिल्म 'द फ्लूट एंड द एरो' (1957): आर्ने सक्सडॉर्फ ने चेंदरू और टेम्बू पर आधारित एक फिल्म बनाई, जिसका मूल स्वीडिश नाम En Djungelsaga था और अंग्रेजी में इसे The Flute and the Arrow नाम से रिलीज किया गया। इस फिल्म ने कांस फिल्म फेस्टिवल सहित दुनिया भर में धूम मचाई।
सचित्र पुस्तक: आर्ने की पत्नी एस्ट्रिड बर्गमैन सक्सडॉर्फ ने चेंदरू पर एक सचित्र पुस्तक लिखी—Chendru: The Boy and the Tiger (1960)। यह किताब कई भाषाओं में अनूदित हुई और यूरोप व अमेरिका के स्कूलों और घरों में बेहद लोकप्रिय हुई।
विदेश यात्रा: फिल्म के प्रीमियर के दौरान चेंदरू को स्वीडन, फ्रांस और ब्रिटेन ले जाया गया, जहां वे वैश्विक मीडिया और मशहूर हस्तियों के बीच छा गए।
अंतरराष्ट्रीय मंचों की चमक-दमक के बाद जब चेंदरू अपने गांव वापस लौटे, तो हालात पूरी तरह बदल चुके थे:
टेम्बू से बिछोह: टेम्बू के बड़े होने पर सुरक्षा कारणों और प्राकृतिक नियमों के चलते उसे दूर जंगल में छोड़ना पड़ा। इसके बाद चेंदरू पूरी तरह अकेले पड़ गए।
गुमनामी और संघर्ष: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद चेंदरू को कोई स्थायी आर्थिक सहयोग नहीं मिला। जीवन के अंतिम दशकों में वे बेहद गरीबी, बीमारी और उपेक्षा में रहे।
निधन: 18 सितंबर 2013 को लगभग 78 वर्ष की आयु में पक्षाघात (लकवा) और उचित इलाज के अभाव में उनका अपने पैतृक गांव में निधन हो गया।