
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। स्कूली शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक कसावट लाने के लिए की गई युक्तियुक्तकरण (रैशनलाइजेशन) नीति में विसंगति अभी तक खत्म नहीं हो पाई है। 16 जून से नया शिक्षा सत्र शुरू हो रहा है, लेकिन अभी तक कुछ शिक्षकों ने युक्तियुक्तकरण के बाद अपने नए स्कूलों में ज्वाइनिंग नहीं दी है।
इस स्थिति पर लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) के संचालक ऋतुराज रघुवंशी ने प्रदेश के सभी संभागीय संयुक्त संचालकों (जेडी) और जिला शिक्षा अधिकारियों (डीईओ) को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया है। अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के तहत नवीन स्कूलों में पदस्थापना के बावजूद कार्यभार ग्रहण न करने वाले और अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित चल रहे कर्तव्यविमुख शिक्षकों के खिलाफ प्रभावी कदम न उठाने को लेकर की गई है।
संचालनालय द्वारा जारी नोटिस में मैदानी अधिकारियों की ढुलमुल कार्यशैली और 'विलंबकारी नीति' पर गंभीर नाराजगी जताई गई है। इससे पूर्व मई माह में ही सभी दागी शिक्षकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद अधिकारियों ने न तो जमीनी स्तर पर कोई ठोस एक्शन लिया और न ही उच्च स्तर से की जाने वाली कार्रवाई के लिए कोई तथ्यात्मक प्रस्ताव संचालनालय को भेजा।
विभाग ने जिम्मेदार अधिकारियों के इस रवैये को बेहद खेदजनक बताते हुए इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-3 का सीधा उल्लंघन माना है। नोटिस में पूछा गया है कि कर्तव्यों के निर्वहन में बरती गई इस शिथिलता के लिए क्यों न उनके खिलाफ छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
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नोटिस में अधिकारियों को दो अलग-अलग समय-सीमाओं के भीतर अनिवार्य कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। पहले निर्देश के तहत, अधिकारियों को तीन दिनों के भीतर नई शालाओं में ज्वाइन न करने वाले लापरवाह शिक्षकों व व्याख्याताओं के विरुद्ध प्रभावी अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए आरोप पत्र (चार्जशीट), आरोपों के अभिकथन और साक्ष्यों की सूची का पूरा प्रारूप तीन प्रतियों में संचालनालय भेजना होगा।
दूसरे निर्देश के तहत, सभी जेडी और डीईओ को एक सप्ताह के भीतर अधोहस्ताक्षरकर्ता के समक्ष उपस्थित होकर या लिखित में अपना स्पष्टीकरण (युक्तियुक्त कारण सहित) प्रस्तुत करना होगा। पत्र में साफ चेतावनी दी गई है कि यदि तय समय में जवाब नहीं मिलता है, तो यह मान लिया जाएगा कि अधिकारियों को अपने बचाव में कुछ नहीं कहना है और उनका यह मामला सीधे कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए शासन (सरकार) को प्रेषित कर दिया जाएगा।