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छत्तीसगढ़ में हनुमान लंगूरों के पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक व्यवहार पर पहली बार हुआ शोध, काले बंदरों की जिंदगी के खुले राज

काले बंदरों की जीवनचर्या, पर्यावरणीय परिस्थितियों और सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए पांच साल तक किए गए शोध के बाद खैरागढ़ विकासखंड के शिक्षक उपेंद्र ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sat, 17 Oct 2026 09:06:32 PM (IST)Updated Date: Sat, 17 Oct 2026 09:10:04 PM (IST)
छत्तीसगढ़ में हनुमान लंगूरों के पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक व्यवहार पर पहली बार हुआ शोध, काले बंदरों की जिंदगी के खुले राज
बंदरों के साथ शोधकर्ता उपेंद्र। सोर्स स्‍वयं

HighLights

  1. हनुमान लंगूरों के सामाजिक व्यवहार पर खैरागढ़ के शिक्षक का बड़ा शोध
  2. छत्तीसगढ़ में हनुमान लंगूरों के सामाजिक व्यवहार पर पहली बार हुआ शोध
  3. घटते जंगलों के कारण बदल रही लंगूरों के खान-पान की प्रवृत्ति

नईदुनिया प्रतिनिधि, राजनांदगांव। काले बंदरों की जीवनचर्या, पर्यावरणीय परिस्थितियों और सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए पांच साल तक किए गए शोध के बाद खैरागढ़ विकासखंड के शिक्षक उपेंद्र कुमार वर्मा ने कई रहस्य खोज निकाले हैं। उपेंद्र वर्मा वर्तमान में मिडिल स्कूल रेंगाकठेरा में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।

छत्तीसगढ़ में इस विषय पर यह पहला शोध

उन्होंने हनुमान लंगूरों (काले बंदरों) की पारिस्थितिकी और सामाजिक व्यवहार पर शोध किया है। शोधार्थी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इस विषय पर यह पहला शोध है। इसमें मानव आबादी और उससे लगे वन क्षेत्रों में काले बंदरों की गतिविधियों का गहन अध्ययन किया गया।


उन्होंने बताया कि घटते जंगल और शहरीकरण के बीच लंगूरों का व्यवहार बदलने लगा है। वे बदलती परिस्थितियों में ढलने का प्रयास करने लगे हैं। अगर, स्थिति ऐसी ही रही तो भविष्य में इनके संरक्षण के लिए रिजर्व फारेस्ट की आवश्यकता पड़ेगी। उन्होंने कहा कि मानवों के आसपास होने का असर इस हद तक है कि लंगूरों की टोली में नियम बदलते देखे जा रहे हैं। उनके भोजन की प्रवृत्तियां भी बदल रहीं हैं।

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इस शोध के लिए उपेंद्र को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई है। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के अंतर्गत शासकीय कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय दुर्ग के शोध केंद्र से उन्हें जंतु विज्ञान विषय में यह उपाधि मिली है। शोध केंद्र के प्राध्यापक डा. संजू सिन्हा के निर्देशन में पूरा हुआ यह अध्ययन वन्यजीव संरक्षण के साथ मानव-वन्यजीव द्वंद्व रोकने में भी उपयोगी साबित हो सकता है।