नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय में कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य के निजी सचिव राजेश कुमार सक्सेना की नियुक्ति, नियमितीकरण और वित्तीय भुगतानों को लेकर विवाद खडा हुआ जो प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संविदा कर्मचारी रहे राजेश सक्सेना को नियमों के विपरीत नियमित कर्मचारी बनाया गया और बाद में उन्हें ग्रेड-पे, समयमान वेतनमान, एरियर सहित कई वित्तीय लाभ दिए गए।
शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्य शासन के माध्यम से विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंच चुकी है। शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
ग्वालियर निवासी शिकायतकर्ता सचिन तोमर का दावा है कि उनकी शिकायत सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों पर आधारित है। शिकायत में तत्कालीन कुलगुरु, तत्कालीन कुलसचिव, प्रशासनिक अधिकारियों, वित्त शाखा, विधि शाखा और नियमितीकरण समिति की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही पूरे मामले का स्वतंत्र वित्तीय आडिट कराकर विश्वविद्यालय को हुए संभावित नुकसान का आकलन कराने की भी मांग उठाई गई है।
संविदा कर्मचारी से नियमित कर्मचारी बनने पर सवाल
शिकायत में कहा गया है कि राजेश कुमार सक्सेना की नियुक्ति वर्ष 1995 में किसी नियमित स्वीकृत पद पर नहीं, बल्कि संविदा के आधार पर हुई थी। इसके बावजूद उन्हें बाद में नियमित कर्मचारी घोषित कर स्टोर कीपर के पद पर पदस्थ कर दिया गया।
आठ साल पीछे से नियमितीकरण पर भी सवाल
तीन जनवरी 2020 को जारी आदेश के जरिए राजेश सक्सेना को 14 मई 2012 से नियमित कर्मचारी माना गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि आठ वर्ष पीछे से नियमितीकरण और वित्तीय लाभ देना नियमों के विरुद्ध प्रतीत होता है। विश्वविद्यालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि वर्ष 2012 में कर्मचारियों को नियमित करने की सूची में राजेश सक्सेना का नाम गलती से छूट गया था। इस पर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि यह केवल त्रुटि थी तो आठ वर्ष तक उसे सुधारा क्यों नहीं गया?
हाई कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या का आरोप
शिकायत में यह भी कहा गया है कि राजेश सक्सेना ने अपने नियमितीकरण को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। शिकायतकर्ता के अनुसार अदालत ने केवल संबंधित प्रकरण पर नियमों के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया था, जबकि विश्वविद्यालय ने उसी आदेश को नियमितीकरण का आधार बनाकर कर्मचारी को स्थायी घोषित कर दिया।
1900 की जगह 2800 ग्रेड-पे देने पर आपत्ति
शिकायत में दावा किया गया है कि नियमितीकरण के बाद राजेश सक्सेना को 1900 ग्रेड-पे के स्थान पर 2800 ग्रेड-पे का लाभ दिया गया। इसके अलावा वर्ष 2018 से 2020 के बीच उन्हें समयमान वेतनमान, भूतलक्षी (रेट्रोस्पेक्टिव) वेतन, लाखों रुपये का एरियर, वार्षिक वेतनवृद्धि, महंगाई भत्ता और वेतन पुनर्निर्धारण सहित अन्य आर्थिक लाभ भी प्रदान किए गए।
रिकार्ड जब्त करने की मांग
शिकायत में कर्मचारी की मूल सेवा पुस्तिका, व्यक्तिगत फाइल, नोटशीट, वेतन निर्धारण, कानूनी राय, नियमितीकरण समिति की कार्रवाई और अनुमोदन से जुड़े सभी रिकार्ड जब्त कर जांच कराने की भी मांग की गई है। इसके अलावा तत्कालीन कुलगुरु, तत्कालीन कुलसचिव, प्रशासनिक अधिकारी, वित्त शाखा, विधि शाखा और नियमितीकरण समिति के सदस्यों की भूमिका की जांच की मांग भी की गई है।
अधिकारियों ने नहीं दिया जवाब
इस मामले में विश्वविद्यालय का पक्ष जानने के लिए कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। कुलसचिव डा. राजीव मिश्रा ने इस मामले में कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया।
कर्मचारी ने आरोप नकारे
वहीं राजेश कुमार सक्सेना ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को निराधार बताते हुए उन्हें गलत करार दिया है। कहा कि शिकायतकर्ता को पत्र भेजकर तथ्य मांगे हैं, सवाल है कि विश्वविद्यालय के पास रिकार्ड होने के बाद तथ्य क्यों मांगे जा रहे हैं और जिसके खिलाफ शिकायत है वह स्वयं ही पत्राचार कैसे कर रहा है?