
लाइफस्टाइल डेस्क। सोशल मीडिया पर bed rotting शब्द का इस्तेमाल खासकर युवाओं के बीच लोकप्रिय हुआ है। इसका मतलब है लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना, फोन चलाना, फिल्में देखना, स्नैक्स खाना या बिना किसी काम के आराम करते रहना। इसे अक्सर भागदौड़ भरी जिंदगी और हर समय प्रोडक्टिव बने रहने के दबाव से ब्रेक लेने के तरीके के रूप में देखा जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरा दिन बिस्तर पर बिताना सच में मानसिक सुकून देता है, या धीरे-धीरे यह हमारी दिनचर्या और सेहत को प्रभावित कर सकता है?
काम, पढ़ाई और निजी जिम्मेदारियों के बीच थक जाना स्वाभाविक है। ऐसे में छुट्टी के दिन कुछ घंटे आराम करना, पसंदीदा शो देखना या फोन चलाना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। हर समय व्यस्त रहना और खुद को लगातार काम करने के लिए मजबूर करना भी जरूरी नहीं।
क्लीवलैंड क्लिनिक के विशेषज्ञों के मुताबिक, कभी-कभार बिस्तर पर आराम करना तनाव से राहत देने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन जब यह बार-बार होने लगे, जरूरी कामों में रुकावट डालने लगे या तनाव से बचने का मुख्य तरीका बन जाए, तो स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
मान लीजिए, कोई व्यक्ति सुबह उठने के बाद घंटों बिस्तर पर फोन चलाता रहता है। धीरे-धीरे उसकी नींद का समय बिगड़ने लगता है, जरूरी काम टलते जाते हैं और दोस्तों या परिवार से मिलने का मन भी कम होने लगता है। अगर ऐसा लगातार हो रहा है, तो इसे सिर्फ आराम की जरूरत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
2018 में Sleep Health जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में 855 वयस्कों के बीच बिस्तर पर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की आदत का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बिस्तर पर ज्यादा समय सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले प्रतिभागियों में अनिद्रा, चिंता और सप्ताह के दिनों में कम नींद की संभावना अधिक थी। हालांकि, यह अध्ययन संबंध दिखाता है, यह साबित नहीं करता कि फोन इस्तेमाल करना ही इन समस्याओं का एकमात्र कारण था।
लंबे समय तक बिस्तर से बाहर निकलने का मन न करना, लगातार थकान महसूस करना, पसंदीदा गतिविधियों में रुचि कम होना या रोजमर्रा के काम करना मुश्किल लगना कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है। लेकिन केवल बिस्तर पर ज्यादा समय बिताने से किसी व्यक्ति को डिप्रेशन होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
2024 में Journal of Affective Disorders में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-एनालिसिस में 182 अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें सोशल मीडिया के समस्याग्रस्त इस्तेमाल और डिप्रेशन, चिंता तथा नींद की समस्याओं के बीच संबंध पाया गया। हालांकि, अलग-अलग अध्ययनों के नतीजों में काफी अंतर था और शोधकर्ताओं ने इस संबंध को बेहतर ढंग से समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत बताई। यह शोध बेड रॉटिंग पर सीधे केंद्रित नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया इस्तेमाल, मानसिक स्वास्थ्य और नींद के व्यापक संबंध पर था।
अगर बिस्तर पर रहने की आदत रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगे, तो कुछ छोटे बदलाव मददगार हो सकते हैं।
अगर लंबे समय तक उदासी, थकान, काम करने की इच्छा में कमी या बिस्तर से उठने में परेशानी बनी रहती है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
बेड रॉटिंग को न तो हर हाल में खराब आदत कहा जा सकता है और न ही इसे हमेशा सेल्फ-केयर का सही तरीका माना जा सकता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि आराम करने के बाद व्यक्ति खुद को बेहतर महसूस करता है या बिस्तर पर रहने की आदत उसकी नींद, काम और रिश्तों को प्रभावित करने लगती है।