
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मदर्स डे पर हर कोई अपनी उस मां को याद करता है, जिसने उसे जन्म देकर जीवन दिया, संस्कार दिए और हर परिस्थिति में उसका साथ निभाया। लेकिन समाज में कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने किसी बच्चे को जन्म नहीं दिया, फिर भी उनकी ममता ने सैकड़ों बच्चों का जीवन रोशन कर दिया।
शहर में ऐसी कई महिलाएं हैं, जो अपने कार्यों और प्रेम के माध्यम से बच्चों के जीवन में मां की भूमिका निभा रही हैं। कोई कला के जरिए बच्चों को आत्मविश्वास दे रही है, तो कोई अनाथ बच्चों को मां का प्यार देकर उनका जीवन संवार रही है।
मदर्स डे के अवसर पर ऐसी ही कुछ महिलाओं से चर्चा की गई, जिन्होंने रिश्तों से नहीं बल्कि भावनाओं से मां बनने का अर्थ समझाया। आज जब समाज में रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं।
तब ऐसी महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि सच्ची मां वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के किसी बच्चे का हाथ थाम ले और उसे जीवन में आगे बढ़ने का साहस दे। स्वाति मोदी तिवारी, हर्षिता समाज को यह संदेश दे रही हैं कि ममता का रिश्ता खून से नहीं, बल्कि दिल से बनता है।
उनकी ममता ने कई बच्चों के जीवन में उम्मीद, आत्मविश्वास और खुशियां भर दी हैं। मदर्स डे केवल जन्म देने वाली मांओं का सम्मान करने का दिन नहीं, बल्कि उन सभी महिलाओं को याद करने का अवसर भी है, जो अपने स्नेह, त्याग और संवेदनाओं से किसी के जीवन में मां की भूमिका निभा रही हैं।
शहर की प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना स्वाति मोदी तिवारी के लिए कथक केवल एक नृत्य कला नहीं, बल्कि बच्चों से जुड़ने और उनके व्यक्तित्व को निखारने का माध्यम है। उनकी डांस क्लास में तीन वर्ष की छोटी बच्चियों से लेकर 40 वर्ष तक की महिलाएं कथक सीखने आती हैं। लेकिन यहां केवल नृत्य नहीं सिखाया जाता, बल्कि बच्चों को भावनात्मक संबल भी मिलता है। उनके विद्यार्थी उन्हें केवल गुरु नहीं मानते, बल्कि मां जैसा स्नेह और अपनापन महसूस करते हैं।
यदि किसी बच्चे का मन उदास हो, कोई पढ़ाई के तनाव से परेशान हो या घर की किसी समस्या से जूझ रहा हो, तो सबसे पहले वह स्वाति के पास पहुंचता है। स्वाति बच्चों की बातें धैर्य से सुनती हैं, उन्हें समझाती हैं और उनका आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। स्वाति कहती हैं कि आज के समय में बच्चों को केवल शिक्षा या कला की नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारे की भी आवश्यकता है।
कई बार बच्चे अपने मन की बातें घर में नहीं कह पाते, लेकिन वे अपनी भावनाएं अपने गुरु या मार्गदर्शक के सामने सहजता से व्यक्त कर देते हैं। ऐसे में उनका प्रयास रहता है कि हर बच्चा खुद को सुरक्षित और आत्मविश्वासी महसूस करे। उनकी डांस क्लास में आने वाले कई बच्चों और अभिभावकों का मानना है कि स्वाति ने केवल नृत्य नहीं सिखाया, बल्कि बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है। कथक के जरिए बच्चों का जीवन संवार रही है।
संगीता कुमार, हर्षिता और कुछ अन्य युवतियों एवं महिलाओं ने अपना जीवन अनाथालय के बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। वे उन बच्चियों के जीवन में ममता और अपनापन भर रही हैं, जिन्हें जन्म के बाद ही दुनिया ने अकेला छोड़ दिया था। संगीता का समय अनाथालय की बच्चियों के बीच गुजरता है।
नवजात बच्चियों से लेकर 16 वर्ष तक की किशोरियों तक, हर बच्ची की दिनचर्या में वे शामिल रहती हैं। बच्चियों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, खान-पान, खेलकूद और भावनात्मक जरूरतों का ध्यान रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।
अनाथालय की बच्चियां उन्हें “मैडम” नहीं, बल्कि “मां” कहकर पुकारती हैं। यह संबोधन संगीता के लिए किसी सम्मान से कम नहीं है। वे कहती हैं कि जब कोई बच्ची प्यार से “मां” कहती है, तो सारी थकान दूर हो जाती है। इन बच्चियों को केवल सुविधाओं की नहीं, बल्कि अपनेपन और भावनात्मक सुरक्षा की सबसे अधिक जरूरत होती है। वे कहती हैं कि मां का प्यार किसी भी बच्चे के आत्मविश्वास और मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है, इसलिए वे हर बच्ची को यह महसूस कराने की कोशिश करती हैं कि वह अकेली नहीं है।