
सुरेन्द्र दुबे नईदुनिया जबलपुर। बदलते दौर में भले ही पिज्जा, बर्गर और कैफे संस्कृति ने शहर में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन जबलपुर के परंपरागत स्वाद आज भी अपनी अलग प्रतिष्ठा और लोकप्रियता बनाए हुए हैं।
सुबह की शुरुआत पोहा-जलेबी से हो और साथ में कुल्हड़ की चाय मिल जाए तो जबलपुरिया दिन का मूड अपने आप बन जाता है। शहर के पुराने बाजार और चौक-चौराहों पर दशकों से यह परंपरा चली आ रही है। हल्दी की खुशबू से महकता पोहा और गरमागरम जलेबी का मेल किसी व्यंजन से अधिक एक सांस्कृतिक अनुभव है।
मावा-बाती और खोपरा पकोड़ी जैसे व्यंजन जबलपुर की विशिष्ट पहचान हैं। बाहर से आने वाला व्यक्ति इन्हें चखकर अक्सर पूछ बैठता है कि ऐसा स्वाद और कहीं क्यों नहीं मिलता।
इन व्यंजनों में केवल सामग्री नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही स्थानीय पाक-परंपरा का रस घुला होता है। पुराने हलवाइयों के हाथों का हुनर और परिवारों में सुरक्षित रखी गई रेसिपियां इन्हें खास बनाती हैं।
नर्मदा तट से जुड़ी आस्था का असर भी यहां के खान-पान में दिखाई देता है। त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर बनने वाले मालपुए, खीर, दाल-बाफला और विभिन्न प्रकार के प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप के माध्यम भी हैं। भोजन यहां पेट भरने का साधन नहीं, रिश्तों को सहेजने का संस्कार है।
शहर के पुराने हिस्सों में आज भी ऐसी कई दुकानें हैं जहां तीसरी-चौथी पीढ़ी अपने पूर्वजों के स्वाद की विरासत को संभाले हुए है। लकड़ी की पुरानी अलमारियां, पीतल के बर्तन और बरसों पुराने तवे इस बात के गवाह हैं कि स्वाद का इतिहास भी किसी धरोहर से कम नहीं होता।
दिलचस्प बात यह है कि आधुनिकता की तेज आंधी भी इन स्वादों को उखाड़ नहीं सकी। युवा पीढ़ी भले ही नए व्यंजनों का आनंद ले रही हो, लेकिन घर लौटते समय पोहा, समोसा, रबड़ी या मावा-बाती का आकर्षण आज भी वैसा ही बना हुआ है। यही कारण है कि जबलपुर का पारंपरिक जायका समय के साथ पुराना नहीं हुआ, बल्कि और अधिक परिपक्व होता गया।
किसी शहर को जानना हो तो उसके भोजन को समझना चाहिए। जबलपुर का स्वाद बताता है कि यह शहर अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। यहां के व्यंजनों में नर्मदा की सहजता, संस्कारों की मिठास और आत्मीयता की गरमाहट एक साथ मिलती है। यही वजह है कि संस्कारधानी का पारंपरिक स्वाद केवल खाने की चीज नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक विरासत है।
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