Bhopal AIIMS: याददाश्त खो चुके युवक को नर्स ने दिखाया मंदिर का फोटो, 6 महीने से लापता बेटे को लेने बांदा से आए माता-पिता
कहते हैं कि अगर सेवा का जज्बा हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। एम्स भोपाल में एक ऐसी ही हृदयस्पर्शी घटना सामने आई है, जहां छह महीने से लापता एक बेटा ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 25 Apr 2026 10:08:30 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Apr 2026 10:50:22 PM (IST)
6 महीने से लापता बेटे को लेने बांदा से आए माता-पिता। (AI से जेनरेट किया गया इमेज)HighLights
- याददाश्त खो चुके युवक को नर्स ने दिखाई मंदिर की फोटो
- 6 महीने से लापता बेटे को लेने बांदा से आए माता-पिता
- पिता पित्तू और मां प्रेमाबाई की आंखों में झलके आंसू
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। कहते हैं कि अगर सेवा का जज्बा हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। एम्स भोपाल में एक ऐसी ही हृदयस्पर्शी घटना सामने आई है, जहां छह महीने से लापता एक बेटा न केवल मौत के मुंह से वापस आया, बल्कि अपनी याददाश्त खोने के बावजूद अपने परिवार से मिल सका। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के रहने वाले वीरेंद्र वर्मा के स्वजन के लिए यह उनके बेटे का पुनर्जन्म जैसा है।
दिवाली पर लापता हुआ था वीरेंद्र
बताया जा रहा है कि बांदा के महोखर गांव के पित्तू वर्मा का बेटा वीरेंद्र (18) मुंबई में काम करता था। पिछले साल दिवाली पर वह मुंबई से गांव लौट रहा था। ट्रेन में ही उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई और वह मथुरा के पास कोसीकलां स्टेशन पर ट्रेन से उतर गया। उसने कोई दूसरी ट्रेन पकड़ ली और भोपाल पहुंच गया। स्वजनों ने उसकी बहुत तलाश की, लेकिन कहीं पता नहीं चला और वे उसे पाने की उम्मीद छोड़ चुके थे।
सड़क दुर्घटना और एम्स में उपचार
बीती छह अप्रैल को मिसरोद पुलिस ने वीरेंद्र को गंभीर अवस्था में एम्स की इमरजेंसी में भर्ती कराया था। किसी अज्ञात वाहन की टक्कर से उसका पैर पूरी तरह कुचल गया था। उसका यहां ऑपरेशन कर वार्ड में शिफ्ट किया गया। उसके पास पहचान का कोई दस्तावेज नहीं था और वह खुद भी कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में उसका इलाज भी अज्ञात के तौर पर ही हो रहा था।
नर्सिंग ऑफिसर ने ऐसे सुलझाई गुत्थी
वार्ड में तैनात नर्सिंग ऑफिसर जगेंद्र चौधरी ने युवक से बातचीत बढ़ानी शुरू की। एक दिन बातचीत के दौरान युवक ने अपने गांव का नाम महोखर बताया। जगेंद्र ने तत्काल गूगल पर इस नाम के गांव को सर्च किया और वहां के मंदिरों के फोटो युवक को दिखाए। एक मंदिर का फोटो देखते ही युवक ने चिल्लाकर कहा कि यह तो मेरे गांव का मंदिर है।
गांव की पुष्टि होते ही जगेंद्र चौधरी ने गूगल पर ही गांव के पास स्थित एक फार्म हाउस का नंबर खोजा। वहां फोन लगाकर उन्होंने गांव के सरपंच का नंबर लिया। सरपंच ने युवक के पिता का नंबर दिया। पिता ने उसे पहचान लिया। जगेंद्र ने उनके दावे की पुष्टि के लिए ऑनलाइन वोटर लिस्ट डाउनलोड कर फोटो, नाम और पिता के नाम का मिलान किया।
पिता पित्तू और मां प्रेमाबाई की आंखों में झलके आंसू
सूचना पर पिता पित्तू वर्मा और मां प्रेमाबाई बदहवास होकर एम्स भोपाल पहुंचे। छह महीने बाद अपने कलेजे के टुकड़े को जिंदा देख मां-बाप के सब्र का बांध टूट गया। वे गले लगकर देर तक रोते रहे।
छह महीने पहले मानसिक संतुलन बिगड़ने से भोपाल आ गया था बांदा का वीरेंद्र। सड़क दुर्घटना के बाद एक महीने से एम्स भोपाल में अज्ञात के तौर पर चल रहा था इलाज। नर्सिंग अफसर की कोशिशों से हुई युवक की पहचान, परिवार को बुलाया तो मिल पाए स्वजन।