
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। आशाराम तिराहा से रत्नागिरी तिराहा तक हो रहे अयोध्या बायपास रोड चौड़ीकरण परियोजना को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रिंसिपल बेंच ने मंजूरी दे दी है। 16.5 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट के तहत सड़क को छह लेन बनाया जाएगा और दोनों ओर सर्विस रोड का निर्माण होगा। परियोजना के लिए 7,871 पेड़ों की कटाई करनी पड़ेगी, लेकिन इसके बदले 80 हजार पौधे लगाने के निर्देश भी दिए हैं।
एनजीटी में याचिका दायर कर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) की इस 16.5 किलोमीटर लंबी परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का विरोध किया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों के कटने से क्षेत्र के तापमान में भारी बढ़ोतरी होगी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, इसलिए परियोजना का मार्ग बदला जाए।
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने माना कि भोपाल शहर में बढ़ते ट्रैफिक के दबाव, लगातार होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और ब्लैक स्पॉट्स (जैसे पीपुल्स मॉल जंक्शन और रत्नागिरी तिराहा) को खत्म करने के लिए इस बायपास का चौड़ीकरण बेहद जरूरी है। इस निर्माण से एयरपोर्ट जाने का समय भी आधा रह जाएगा। ट्रिब्यूनल ने कहा कि जब तक कोई परियोजना कानून या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करती, तब तक बुनियादी ढांचे के विकास को रोका नहीं जा सकता।
कमेटी के हस्तक्षेप से बचे 2,017 पेड़। इस मामले में एनजीटी के निर्देश पर मध्य प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस) की अध्यक्षता में एक हाई लेवल सेंट्रली एम्पायर्ड कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी के निर्देश के बाद एनएचएआइ ने अपनी डीपीआर में बदलाव करते हुए सड़क के बीच बनने वाले मीडियन (विभाजक) की चौड़ाई को 5 मीटर से घटाकर 1.5 मीटर कर दिया। इस बदलाव के कारण प्रभावित होने वाले पेड़ों की संख्या 9,888 से घटकर 7,871 रह गई, यानी कम से कम 2,017 पेड़ों को कटने से बचा लिया गया।
सुनिश्चित करनी होगी 90 प्रतिशत पौधों के जीवित रहने की दर। अधिकरण ने कहा कि परियोजना के तहत एनएचएआइ को काटे जाने वाले 7,871 पेड़ों के बदले 80 हजार पौधे लगाने होंगे, इनमें 10 हजार पौधे बायपास किनारे और 70 हजार पौधे झिरनिया व झगरिया खुर्द क्षेत्र में लगाए जाएंगे। एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि पौधारोपण में केवल स्थानीय प्रजातियों जैसे नीम और महुआ का उपयोग होगा, जबकि पाम जैसी विदेशी प्रजातियों पर रोक रहेगी। इसके अलावा लगाए गए पौधों की 15 वर्षों तक निगरानी, जियो-टैगिंग और ड्रोन मॉनिटरिंग भी अनिवार्य की गई है और लगाए गए पौधों के कम से कम 90 प्रतिशत जीवित रहने की दर सुनिश्चित करनी होगी।
सड़क भराव के लिए पुराने कचरे का करना होगा उपयोग। ट्रिब्यूनल ने एनएचएआइ को निर्देश देते हुए कहा कि पर्यावरण को और अधिक अनुकूल बनाने के लिए एनएचएआइ इस प्रोजेक्ट और इससे जुड़े अन्य निर्माणों में भोपाल के भानपुर खंती और आदमपुर छावनी में पड़े सालों पुराने लाखों टन ठोस कचरे (इनर्ट वेस्ट) का इस्तेमाल सड़क भराव के लिए करेगी। धूल और वायु प्रदूषण को रोकने के लिए निर्माण स्थल पर हर तीन महीने में एयर क्वालिटी और नॉइज़ मॉनिटरिंग की जाएगी।
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