
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। सपनों की उड़ान अक्सर उन्हीं घरों से निकलती है, जहां संसाधन कम लेकिन हौसले बड़े होते हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है सात बहन और एक भाई में से छठे नंबर की ज्योति राजोरे की, जिन्होंने सीमित साधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपने लक्ष्य को साधते हुए डिप्टी कलेक्टर बनने का गौरव हासिल किया।
देवास जिले के कन्नौद तहसील के छोटे से गांव पानीगांव में जन्मी ज्योति का बचपन साधारण किसान परिवार में बीता। सात भाई-बहनों के बीच पली-बढ़ी ज्योति के पिता जगन्नाथ राजोरे ने खेती करते हुए भी शिक्षा को प्राथमिकता दी। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को गांव से बाहर पढ़ने भेजा। यही विश्वास आगे चलकर ज्योति की सबसे बड़ी ताकत बना।
ज्योति को आज भी वह दिन याद है जब कॉलेज में प्रवेश का आखिरी दिन था और फीस जमा करने की चिंता उन्हें रुला रही थी। खेत में काम कर रहे पिता जगन्नाथ के पास पहुंची तो उन्होंने बिना देर किए काम छोड़ा और किसी तरह फीस का इंतजाम किया। उस दिन पिता का यह संघर्ष उनके जीवन का संकल्प बन गया।
इंदौर के गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज से बीएचएमएस की पढ़ाई के दौरान ही ज्योति का विवाह भोपाल अशोका गार्डन निवासी ओमप्रकाश बगबैया से हो गया। शादी के बाद जीवन की जिम्मेदारियां बढ़ीं, लेकिन सपनों की दिशा नहीं बदली।
सास सावित्री और ससुर सुखराम बगबैया ने बेटी की तरह अपनाया, हर कदम पर साथ दिया, बल्कि छोटे से बेटे दर्श के साथ-साथ घर की सारी जिम्मेदारियां संभालीं और माता-पिता की कमी का अहसास नहीं होने दिया।
बेटे के चार साल का होने पर वर्ष 2018 से ज्योति ने एमपीपीएससी की तैयारी शुरू की। दिनभर घर और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद रात नौ बजे बेटे को सुलाकर वे देर रात तक पढ़ाई करतीं। अलग स्टडी रूम नहीं था, संसाधन सीमित थे, लेकिन इरादे मजबूत थे। उन्होंने अपनी मित्र की पुरानी किताबों से पढ़ाई की, खुद नोट्स बनाए और लाइब्रेरी में समय बिताकर तैयारी की।
ज्योति बताती हैं कि सफलता का रास्ता आसान नहीं था। वर्ष 2019 और 2020 में असफलता ने निराश किया। समय बीतता जा रहा था और मन डगमगाने लगा था। ऐसे में पति ओमप्रकाश का विश्वास संबल बना। उनके एक वाक्य, "तुम्हारा नहीं होगा तो किसका होगा", इसने जैसे शरीर के अंदर एक नई ऊर्जा भर दी।
फिर वह घड़ी आई वर्ष 2021 में ज्योति ने एमपीपीएससी परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करते हुए डिप्टी कलेक्टर पद प्राप्त किया और मेरिट सूची में दसवीं रैंक हासिल की। यह सफलता सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग और विश्वास की जीत थी।
इन दिनों ज्योति राजगढ़ जिले में डिप्टी कलेक्टर होने के साथ जिला जनगणना अधिकारी हैं। वे सामाजिक न्याय विभाग राजगढ़ में उपसंचालक के रूप में कार्य करते हुए समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में योगदान भी दे रही हैं।
उनकी माता सावित्री और पिता जगन्नाथ भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी सफलता हर उस सपने को जीवित करती है, जो एक पिता ने अपनी बेटी के लिए देखा था। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो मंजिल जरूर मिलती है।