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ऑपरेशन विजय: 'ऊंची चोटियों पर बैठा था दुश्मन, पर सेना के साहस और तोपखाने ने पलट दी बाजी': पूर्व सैन्य अफसरों ने बताई जीत की दास्तान

सीमित ऑक्सीजन, दुर्गम पहाड़ों और दुश्मन की ऊंची चौकियों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और बेहतर सैन्य रणनीति से युद्ध जीता।

By dilip mangtaniEdited By: bhupendra Singh Rajput
Publish Date: Sun, 26 Jul 2026 09:52:43 AM (IST)Updated Date: Sun, 26 Jul 2026 09:52:43 AM (IST)
ऑपरेशन विजय: 'ऊंची चोटियों पर बैठा था दुश्मन, पर सेना के साहस और तोपखाने ने पलट दी बाजी': पूर्व सैन्य अफसरों ने बताई जीत की दास्तान
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी सूबेदार मेजर तेजासिंह सोढ़ी और कर्नल नारायण पारवानी। नईदुनिया।

HighLights

  1. 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल में हुआ था ऑपरेशन विजय
  2. रणनीतिक चोटियों पर दोबारा तिरंगा फहराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की
  3. कारगिल युद्ध में 527 सैनिक शहीद और 1,300 से अधिक घायल हुए

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस, धैर्य और सैन्य कौशल का ऐसा अध्याय है, जिसे देश हर वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में याद करता है।

वर्ष 1999 में जम्मू-कश्मीर के कारगिल, द्रास, बटालिक और आसपास के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में लड़े गए इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने अत्यंत विषम परिस्थितियों के बीच दुश्मन के कब्जे से रणनीतिक चोटियों को मुक्त कराया।

सीमित ऑक्सीजन, दुर्गम पहाड़ियां की चुनौती

सीमित ऑक्सीजन, दुर्गम पहाड़ियां और दुश्मन की ऊंची स्थिति जैसी चुनौतियों के बावजूद सेना ने एक-एक चोटी पर दोबारा तिरंगा फहराया। नईदुनिया से चर्चा में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने कहा कि इस युद्ध ने भारतीय सेना के अनुशासन, धैर्य और अदम्य साहस को पूरी दुनिया के सामने स्थापित किया।

उनका कहना है कि शुरुआती चरण में घुसपैठियों ने ऊंची चोटियों पर कब्जा कर सामरिक बढ़त बना ली थी, लेकिन भारतीय सेना ने सुनियोजित अभियान चलाकर सभी प्रमुख ठिकानों को वापस अपने नियंत्रण में ले लिया।

असाधारण साहस और धैर्य का परिचय

सेवानिवृत्त कर्नल नारायण पारवानी ने बताया कि कारगिल युद्ध दुनिया के सबसे अधिक ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्रों में लड़ा गया था। सैनिकों को अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में चढ़ाई करते हुए अभियान चलाना पड़ा। उन्होंने कहा कि युद्ध में भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस और धैर्य का परिचय दिया।


आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस युद्ध में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए, जबकि 1,300 से अधिक सैनिक घायल हुए। उन्होंने कहा कि कारगिल विजय उन सभी सैनिकों के बलिदान और समर्पण की स्मृति है, जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

यह भी पढ़ें- Kargil Vijay Diwas 2025: भूखे पेट लड़े, फिर भी नहीं छोड़ी पोस्ट... कारगिल युद्ध में जवानों की वीरता की दास्तां

तोपों के आगे पाकिस्तान ने टेके घुटने

सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर तेजासिंह सोढ़ी ने बताया कि पाकिस्तान ने पहले से तैयारियों के साथ ऊंची चोटियों पर मोर्चे बना लिए थे, जिससे शुरुआती दौर में अभियान चुनौतीपूर्ण रहा। बाद में भारतीय सेना ने बेहतर रणनीति, समन्वित कार्रवाई और प्रभावी तोपखाना समर्थन के बल पर स्थिति अपने पक्ष में कर ली।

उन्होंने कहा कि बोफोर्स होवित्जर तोपों ने दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे सेना को आगे बढ़ने में मदद मिली। सूबेदार मेजर सोढ़ी का कहना था कि युद्ध के दौरान उनकी तैनाती गुजरात के कच्छ-भुज क्षेत्र में थी।

उस समय पश्चिमी सीमा पर भी पूरी सतर्कता बरती जा रही थी, ताकि किसी भी संभावित सैन्य स्थिति का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।