
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। बैंक में 18 से 70 साल के बचत खाता धारकों को दुर्घटना मृत्यु अथवा अपंगता की स्थिति में राहत देने के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना शुरू हुई थी। इसके तहत 20 रुपये के वार्षिक प्रीमियम पर दो लाख तक की बीमा सुरक्षा मिलना है, लेकिन बीमा कंपनियां तकनीकी दांव पेंच लगाकर इस जिम्मेदारी से बच निकलती हैं। राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपने हाल के एक फैसले में इस प्रवृत्ति पर तीखी चोट की है। इस फैसले से उस मां को 10 साल बाद राहत मिली है, जिसका बेटा कुएं में डूब कर मर गया था।
दरअसल, राजगढ़ जिले के नाईहेड़ा गांव की गंगा बाई का बेटे का प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना से एसबीआइ जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से दुर्घटना बीमा हुआ था। बीमित अवधि एक जून 2015 से 31 मई 2016 तक थी। 30 अक्टूबर 2015 को युवक की कुएं में डूबने से मृत्यु हो गई थी। बीमा कंपनी ने दुर्घटना को आत्महत्या बताकर दावा खारिज कर दिया। मृतक की माता एवं ग्रामीणों द्वारा यह तथ्य प्रस्तुत किया गया कि युवक को मिर्गी के दौरे पड़ते थे, जिसके कारण वह कुएं में गिर पड़ा था। जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के पक्ष में निर्णय दिया तो गंगा बाई ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने मृतक के मेडिकल रिकार्ड आदि को देखने के बाद कहा कि यह आत्महत्या का मामला था इसे मानने का कोई ठोस आधार नहीं बनता, इसलिए बीमा कंपनी को मुआवजा देना होगा। सुनवाई के बाद उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष सुनीता यादव व सदस्य मोनिका मलिक की बेंच ने बीमा कंपनी को फटकार लगाई। उनका कहना था कि मृतक की मां को पहले ही मुआवजा मिलना चाहिए था, लेकिन कंपनी बहाने बनाकर बीमा देने से बचती रही। उन्होंने दो माह के अंदर छह प्रतिशत ब्याज के साथ दो लाख की बीमा राशि और पांच हजार रुपये वाद व्यय के रूप में देने का आदेश जारी किया।
राज्य उपभोक्ता आयोग का यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आयोग ने सभी तथ्यों एवं साक्ष्यों पर विचार करते हुए मृत्यु को दुर्घटनाजन्य मानते हुए बीमा कंपनी को बीमा राशि के साथ क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है। - मोना पालिवाल, उपभोक्ता पक्ष की अधिवक्ता