MP में कुपोषण का बढ़ता संकट, 6000 करोड़ खर्च के बाद भी क्यों कमजोर हो रहा प्रदेश का भविष्य?
एनएफएचएस-6 रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में कुपोषण की गंभीर तस्वीर उजागर की है। हजारों करोड़ खर्च के बावजूद वेस्टिंग और अंडरवेट बढ़े हैं, जबकि आदिवासी जिलों ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 15 Jun 2026 11:30:09 AM (IST)Updated Date: Mon, 15 Jun 2026 11:30:09 AM (IST)
MP में कुपोषण का बढ़ता संकट। (फाइल फोटो)HighLights
- मध्य प्रदेश में तीव्र कुपोषण राष्ट्रीय औसत से ज्यादा।
- वेस्टिंग और अंडरवेट के आंकड़ों में बढ़ोतरी दर्ज हुई।
- 6000 करोड़ खर्च के बावजूद नहीं दिखा अपेक्षित सुधार।
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है। सरकारें उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हैं। मध्य प्रदेश सरकार भी वर्षों से कुपोषण के खिलाफ अभियान चला रही है और हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-6 की ताजा रिपोर्ट ने प्रदेश के सामने एक चिंताजनक तस्वीर रख दी है।
रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में कुपोषण घटने के बजाय कई महत्वपूर्ण संकेतकों में बढ़ गया है। यह न केवल सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि प्रदेश के भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।
देश में सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में मध्य प्रदेश
- एनएफएचएस-6 (2023-24) की रिपोर्ट के अनुसार तीव्र कुपोषण (वेस्टिंग) के मामले में मध्य प्रदेश देश में सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में शामिल है। प्रदेश में वेस्टिंग का स्तर 23.8 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत 19.3 प्रतिशत है। चिंता की बात यह है कि एनएफएचएस-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 18.9 प्रतिशत था। यानी चार वर्षों में इसमें 4.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
- कम वजन (अंडरवेट) वाले बच्चों का प्रतिशत भी बढ़ा है। एनएफएचएस-5 में यह 33 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 39.7 प्रतिशत हो गया है। इस मामले में झारखंड के बाद मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है। गंभीर वेस्टिंग की श्रेणी में भी स्थिति खराब हुई है और यह 6.5 प्रतिशत से बढ़कर 6.8 प्रतिशत हो गई है।
ठिगनेपन में सुधार, लेकिन तस्वीर अभी भी चिंताजनक
- कुपोषण के सबसे गंभीर संकेतकों में से एक स्टंटिंग यानी ठिगनापन है। यह बच्चों की उम्र के अनुसार कम ऊंचाई को दर्शाता है और लंबे समय तक पोषण की कमी का परिणाम माना जाता है। इस मामले में कुछ राहत जरूर मिली है। एनएफएचएस-5 में स्टंटिंग 35.7 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 31.4 प्रतिशत हो गई है। इसके बावजूद प्रदेश में हर तीन बच्चों में एक बच्चा ठिगनेपन का शिकार है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि स्टंटिंग में कमी सकारात्मक संकेत है, लेकिन वेस्टिंग और अंडरवेट में वृद्धि यह बताती है कि पोषण संबंधी समस्याएं अभी भी गंभीर रूप से मौजूद हैं।
हजारों करोड़ खर्च के बाद भी क्यों नहीं मिल रहे परिणाम?
- मध्य प्रदेश सरकार कुपोषण मिटाने के लिए प्रतिवर्ष लगभग 6000 करोड़ रुपये खर्च करती है। महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बच्चों और माताओं के पोषण पर काम कर रहे हैं। वर्ष 2026-27 के बजट में केवल सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण 2.0 कार्यक्रम के लिए ही 3863 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
- इसके बावजूद आंकड़े सुधार की बजाय गिरावट दिखा रहे हैं। इससे योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी व्यवस्था और लाभार्थियों तक सुविधाएं पहुंचाने के तरीके पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एनआरसी से लौटने के बाद फिर कुपोषित हो रहे बच्चे
- गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती किया जाता है। यहां उन्हें 14 दिन तक विशेष आहार और चिकित्सा सुविधा दी जाती है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत बच्चे एनआरसी में भर्ती होने के बाद भी कुपोषण से बाहर नहीं निकल पाते।
- इसके अलावा 10 से 20 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अस्पताल से स्वस्थ होकर घर तो लौटते हैं, लेकिन परिवार में पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण दोबारा गंभीर कुपोषण की श्रेणी में पहुंच जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार और समुदाय स्तर पर भी है।
माताओं में एनीमिया और स्तनपान की घटती दर बड़ी वजह
- शिशु रोग विशेषज्ञ और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के पूर्व संचालक डॉ. पंकज शुक्ला के अनुसार कुपोषण के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ी चिंता छह माह तक केवल स्तनपान कराने की दर में आई गिरावट है। एनएफएचएस-5 में यह 74 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 56 प्रतिशत रह गई है।
- इसके अलावा प्रदेश की लगभग 55 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। ऐसी स्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों में भी कुपोषण और खून की कमी का खतरा बढ़ जाता है। गरीबी, पोषण संबंधी जागरूकता की कमी, बार-बार होने वाली बीमारियां, डायरिया और पेट के कीड़े भी कुपोषण के प्रमुख कारण हैं।
आदिवासी क्षेत्रों में सबसे गंभीर हालात
- प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले कुपोषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। श्योपुर, बड़वानी, धार, झाबुआ, आलीराजपुर, खरगोन, खंडवा और डिंडौरी जैसे जिलों में स्थिति अधिक चिंताजनक है। सहरिया, बैगा और भारिया जैसी जनजातियों में कुपोषण का स्तर सामान्य आबादी की तुलना में काफी अधिक है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इन क्षेत्रों में गरीबी, बाल विवाह, मातृ स्वास्थ्य की खराब स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच समस्या को और गंभीर बनाती है। आंगनबाड़ी नेटवर्क बड़ा, लेकिन असर सीमित
- प्रदेश में 97,882 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। इनमें से 48,107 केंद्र शासकीय भवनों में चल रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में 0 से 6 माह तक के 3.44 लाख, छह माह से तीन वर्ष तक के 25.41 लाख और तीन से छह वर्ष तक के 32.03 लाख बच्चे पंजीकृत हैं।
- इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद कुपोषण के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन में अभी भी कई खामियां मौजूद हैं।
कैग रिपोर्ट ने भी उठाए थे सवाल
- कुपोषण से लड़ने के लिए वितरित किए जाने वाले टेक होम राशन (टीएचआर) को लेकर भी कई सवाल उठ चुके हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने वर्ष 2023 की रिपोर्ट में राशन की गुणवत्ता, परिवहन में गड़बड़ियों, फर्जी लाभार्थियों और वास्तविक बच्चों की संख्या में अंतर जैसी कई अनियमितताओं का उल्लेख किया था।
- इन गड़बड़ियों ने यह संकेत दिया कि योजनाओं के लिए आवंटित संसाधन हमेशा जरूरतमंदों तक प्रभावी तरीके से नहीं पहुंच पा रहे हैं।
अब क्या करने की जरूरत?
- विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बजट बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। मातृ स्वास्थ्य, स्तनपान को बढ़ावा, पोषण शिक्षा, बाल विवाह पर रोक, नियमित स्वास्थ्य जांच और आंगनबाड़ी सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही भी मजबूत करनी होगी।
- कुपोषण केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है। यह शिक्षा, आर्थिक विकास और मानव संसाधन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय है। यदि आज बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में प्रदेश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि वह आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीन पर कुपोषण को हराकर अपने भविष्य को मजबूत बनाए।