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एमपी सरकार का बड़ा फैसला... सरकारी अस्पतालों में अब नहीं मिलेंगी बेअसर एंटीबायोटिक दवाएं, नई योजना लागू

सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेअसर हो चुकी एंटीबायोटिक दवाएं नहीं दी जाएंगी। सरकार ने एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने की समस्या यानी एंटीमाइक्रोबियल...और पढ़ें

By mukesh vishwakarmaEdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Mon, 06 Jul 2026 06:43:36 PM (IST)Updated Date: Mon, 06 Jul 2026 06:43:36 PM (IST)
एमपी सरकार का बड़ा फैसला... सरकारी अस्पतालों में अब नहीं मिलेंगी बेअसर एंटीबायोटिक दवाएं, नई योजना लागू
एमपी सरकार का बड़ा फैसला...

HighLights

  1. एमपी में नहीं मिलेंगी बेअसर दवाएं, 'एमपी-सैप-एएमआर 2.0' योजना शुरू
  2. मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में लगेंगी शेकर इन्क्यूबेटर मशीनें
  3. 2030 तक एंटीबायोटिक दवाओं के सही इस्तेमाल को 50% बढ़ाने का लक्ष्य

मुकेश विश्वकर्मा, नईदुनिया, भोपाल। अब सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेअसर हो चुकी एंटीबायोटिक दवाएं नहीं दी जाएंगी। प्रदेश सरकार ने एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने की समस्या यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से निपटने के लिए मध्यप्रदेश राज्य कार्ययोजना 2.0 - एमपी-सैप-एएमआर 2.0 शुरू कर दी है।

यह योजना अगले पांच साल तक यानी 2026 से 2030 तक चलेगी। इसे प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) मिलकर चलाएंगे। योजना का मुख्य मकसद एंटीबायोटिक का सही इस्तेमाल, लोगों में जागरूकता और अस्पतालों में संक्रमण रोकथाम है।

जिला अस्पतालों की लैब में लगेंगी शेकर इन्क्यूबेटर मशीनें

इसी योजना के तहत अब प्रदेश के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों की लैब में शेकर इन्क्यूबेटर मशीनें लगाई जाएंगी। यह मशीन बैक्टीरिया और फफूंद को तय तापमान और नमी में उगाती है। इसके बाद उस पर अलग-अलग दवाओं का असर देखा जाएगा। इससे डॉक्टर तुरंत पता लगा सकेंगे कि मरीज के शरीर में मौजूद कीटाणु पर कौन सी दवा काम कर रही है और कौन सी दवा बेअसर हो गई है।


स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे टीबी, खून में संक्रमण, निमोनिया और फंगल बीमारियों के इलाज में सही दवा समय पर मिल सकेगी। इससे मरीज का इलाज जल्दी होगा और एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल भी रुकेगा। साथ ही मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों को नई दवा और टीके पर शोध करने में भी मदद मिलेगी।

क्या है एमपी-सैप-एएमआर 2.0 और इसका फोकस?

एमपी-सैप-एएमआर 2.0 का फोकस चार बातों पर है।

  • पहला- अस्पतालों में संक्रमण को रोकना।
  • दूसरा- डॉक्टरों और फार्मासिस्ट को एंटीबायोटिक लिखने का सही प्रशिक्षण देना।
  • तीसरा- आम लोगों को जागरूक करना कि बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक न लें।
  • चौथा- लैब की जांच क्षमता को मजबूत करना ताकि दवा प्रतिरोध की निगरानी बेहतर हो सके।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मशीनें लगने के बाद हर महीने रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी। इससे यह पता चल सकेगा कि किस जिले में कौन सा बैक्टीरिया किस दवा के प्रति प्रतिरोधी हो रहा है। उसके आधार पर आगे की नीति बनाई जाएगी।

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एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस आज के समय की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है। एमपी-सैप-एएमआर 2.0 के जरिए हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मरीज को पहली बार में ही सही दवा मिले। शेकर इन्क्यूबेटर मशीनें लगने से हमारी लैब की क्षमता कई गुना बढ़ेगी। इससे न केवल इलाज बेहतर होगा बल्कि दवाओं के दुरुपयोग पर भी लगाम लगेगी। हमारा लक्ष्य है कि 2030 तक प्रदेश में एंटीबायोटिक का तर्कसंगत उपयोग 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। - सलोनी सिडाना, मिशन संचालक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मप्र।