
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश में बाघों और अन्य वन्यजीवों के बढ़ते हमले चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। वन्यजीव-मानव संघर्ष को रोकने के लिए सरकार और वन विभाग द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है।
आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में बाघों के हमलों में 380 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में ही कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और अन्य टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में बाघ व तेंदुए के हमलों से 21 लोगों की मौत दर्ज की गई है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में पर्याप्त कृत्रिम जल स्रोत विकसित नहीं किए जा सके हैं। यदि समय रहते जल प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था होती तो वन्यजीवों को आबादी वाले क्षेत्रों की ओर नहीं जाना पड़ता। वर्ष 2025 में अकेले बाघों के हमलों में 71 लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद वन विभाग ने सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश भी जारी किए थे।
वन्यजीव-मानव संघर्ष कम करने के लिए संरक्षित क्षेत्रों के भीतर बसे गांवों को पुनर्स्थापित करने की योजना भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है। पिछले पांच वर्षों में केवल 32 गांवों का ही पुनर्वास किया है, जबकि कई अन्य गांव अब भी संरक्षित क्षेत्रों में बसे हुए हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को राज्य आपदा घोषित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही है। इसके साथ ही राज्य स्तरीय टास्क फोर्स और वन मुख्यालय में कमांड एंड कंट्रोल रूम स्थापित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है। सरकार का मानना है कि इससे वन्यजीवों की निगरानी और संघर्ष की घटनाओं पर त्वरित नियंत्रण संभव हो सकेगा।