
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। गांधी मेडिकल कालेज से जुड़े हमीदिया अस्पताल के शिशु रोग विभाग के डाक्टरों ने गंभीर हालत में पहुंचे चार वर्षीय बच्चे का सफल इलाज किया। बच्चे के चारों हाथ-पैर में अचानक तेजी से कमजोरी आने लगी थी। इसके साथ उसे बोलने और सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। हालत गंभीर होने पर बच्चे को तत्काल पीआईसीयू में भर्ती किया गया। जांच के बाद बच्चे में गिलियन-बैरे सिंड्रोम की पुष्टि हुई।
इस बीमारी में नसों पर असर पड़ने से शरीर की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। गंभीर स्थिति में सांस लेने वाली मांसपेशियां भी काम करना कम कर देती हैं। पीआईसीयू में भर्ती करने के बाद बच्चे की हालत को देखते हुए उसे मैकेनिकल वेंटिलेशन की जरूरत पड़ी। डॉक्टरों ने आईवीआईजी के साथ अन्य जरूरी सपोर्टिव थेरेपी शुरू की। बच्चे को लंबे समय तक श्वसन संबंधी सहायता की आवश्यकता रही। इलाज के दौरान करीब दो महीने तक मैकेनिकल और ट्रेकियोस्टोमी वेंटिलेशन दिया गया।
लगातार उपचार और विशेषज्ञ डाक्टरों की निगरानी के बाद बच्चे की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। उसके हाथ-पैर में ताकत वापस आने लगी और सांस लेने की स्थिति भी बेहतर हुई। चिकित्सकों ने श्वसन प्रबंधन के साथ अन्य जरूरी उपचार जारी रखा। अस्पताल से छुट्टी के समय बच्चे की रिकवरी संतोषजनक थी। अब वह सामान्य रूप से बोल पा रहा है।
गिलियन-बैरे सिंड्रोम नसों से जुड़ी एक बीमारी है। इसमें शरीर की नसों पर अचानक असर पड़ने से हाथ-पैर में कमजोरी या लकवा जैसी स्थिति बन सकती है। यह कमजोरी तेजी से बढ़ सकती है। कुछ गंभीर मरीजों में सांस लेने वाली मांसपेशियां भी प्रभावित हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है। समय पर बीमारी की पहचान और उपचार से मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है।
जीएमसी अधिष्ठाता डा. कविता एन. सिंह, हमीदिया अस्पताल अधीक्षक डा. सुनीत टंडन और शिशु रोग विभागाध्यक्ष डा. मंजूषा गोयल के मार्गदर्शन में बच्चे का उपचार किया गया। उपचार करने वाली टीम में डा. अमित अग्रवाल, डा. श्वेता शर्मा, डा.मोहम्मद शाहिद, स्नातकोत्तर छात्र डा.तुषार, डा. अंचल, डा. अजय और डा. फरीदा शामिल रहे।