
राज्य ब्यूरो, भोपाल। देश में 1 अप्रैल 2026 से 16वां वित्त आयोग लागू होने जा रहा है। इस नए आयोग की अनुशंसाओं से मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यों को केंद्रीय करों में मिलने वाले हिस्से में बड़ी वृद्धि की उम्मीद है। वर्तमान में राज्यों को केंद्रीय करों का 41 प्रतिशत हिस्सा मिलता है, जिसे बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने पुरजोर वकालत की है। 16वें वित्त आयोग की ये सिफारिशें वित्तीय वर्ष 2030-31 तक प्रभावी रहेंगी।
मध्य प्रदेश सरकार ने आयोग के समक्ष मांग रखी है कि राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 42 प्रतिशत किया जाए। यदि उपकर (Cess) को हटा दिया जाए, तो इसे 48 प्रतिशत तक करने का आग्रह किया गया है। वर्तमान में मध्य प्रदेश को कुल संग्रहित केंद्रीय करों में 7.85 प्रतिशत की हिस्सेदारी मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई अनुशंसाओं के बाद प्रदेश को मिलने वाली राशि में 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इस अतिरिक्त फंड का उपयोग पूंजीगत व्यय के माध्यम से अधोसंरचना (Infrastructure) विकास को गति देने में किया जाएगा, जिसकी विस्तृत घोषणा आगामी राज्य बजट में संभावित है।
वित्त विभाग के अधिकारियों के अनुसार, प्रदेश के बजट का एक बड़ा हिस्सा केंद्रीय करों और सहायता अनुदान पर निर्भर है। अनुमान है कि वर्ष 2025-26 में केंद्रीय करों के हिस्से से प्रदेश को 1,11,662 करोड़ रुपये और केंद्रीय सहायता अनुदान के रूप में 48,661 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे। इस प्रकार, राज्य की कुल राजस्व प्राप्ति में केंद्र का योगदान लगभग 43 प्रतिशत रहता है। हालांकि, जीएसटी क्षतिपूर्ति बंद होने और नई दरों के प्रभाव से राज्य को करीब 8,600 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का भी अनुमान है, जिसकी भरपाई के लिए केंद्रीय हिस्सेदारी बढ़ना आवश्यक है।
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राज्य सरकार ने अपनी मांगों के समर्थन में प्रदेश में हो रहे चहुंमुखी विकास को आधार बनाया है। वित्त आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट में कृषि, बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, वन संरक्षण, पर्यटन, शहरी विकास और औद्योगिक क्षेत्रों में हुई प्रगति का हवाला दिया गया है। जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों के पास स्वयं के कर लगाने के सीमित अवसर बचे हैं, ऐसी स्थिति में मध्य प्रदेश ने तर्क दिया है कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्रीय करों में राज्यों की भागीदारी बढ़ाना न्यायसंगत होगा।