90 साल बाद खुलेगा उज्जैन की वैश्य टेकरी का राज, रडार से 50 फीट नीचे तक खोजी जाएंगी अशोककालीन संरचनाएं
उज्जैन की अशोककालीन वैश्य टेकरी का 90 साल बाद फिर अध्ययन होगा। मैनिट ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार से जमीन के नीचे 50 फीट तक संरचनाओं का पता लगाएगा।
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 09:37:26 AM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 09:37:26 AM (IST)
90 साल बाद खुलेगा उज्जैन की वैश्य टेकरी का राज। (नईदुनिया)HighLights
- वैश्य टेकरी का करीब 90 साल बाद फिर अध्ययन होगा।
- मैनिट रडार से जमीन के नीचे संरचनाएं तलाशेगा।
- रडार करीब 50 फीट गहराई तक संकेत देगा।
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल : उज्जैन की अशोककालीन वैश्य टेकरी में करीब 90 साल बाद इतिहास की परतें खोलने की तैयारी हो रही है। अब मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) भी इसके अध्ययन में शामिल होगा।
मैनिट जमीन में बिना खोदाई किए रडार के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास करेगा कि सतह के नीचे क्या मौजूद है। इससे जमीन में करीब 50 फीट नीचे तक मौजूद ठोस संरचनाओं के संकेत मिलने की उम्मीद है और आगे कहां तथा किस हिस्से में खोदाई की जाए, इसकी रूपरेखा तैयार करने में मदद मिलेगी।
सांची के स्तूप से भी बड़ा माना जाता है
- वैश्य टेकरी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहां मौजूद स्तूप को सांची के स्तूप से भी बड़ा माना जाता है। माना जाता है उज्जैन के गवर्नर रहने के दौरान सम्राट अशोक ने अपनी पत्नी देवी की याद में इसे बनवाया था।
पुराने संदर्भों के अनुसार, 1938-39 में हुई खोदाई में यहां बड़ी आकार की ईंटें और पंच-चिह्नित सिक्के मिले थे। उस समय स्तूप के आधार का व्यास करीब 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट आंकी गई थी। सांची के मुख्य स्तूप की ऊंचाई करीब 54 फीट है। ब्रिटिश काल में गैस रिसाव के कारण रुका था काम
- ब्रिटिश काल में वर्ष 1938 में यहां खोदाई शुरू की गई थी। इसके दौरान महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्री सामने आई, लेकिन बाद में गैस के रिसाव के कारण काम रोकना पड़ा। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) भोपाल मंडल ने इसके संरक्षण और खोदाई का प्रस्ताव अपने केंद्रीय कार्यालय को भेजा है।
एएसआइ भोपाल मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. शिवाकांत वाजपेयी का कहना है कि खोदाई के बाद ही वास्तविक स्थिति पता चलेगी। खोदाई के बाद राज्य सरकार इसे बुद्ध लोक की तरह विकसित करने की तैयारी कर रही है। आयुक्त पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार मदन कुमार नागरगोजे ने कहा कि रडार से अध्ययन के लिए मैनिट से प्रबंधन से बात हुई। एएसआइ की सहमति मिलने पर अध्ययन कराया जाएगा। कैसे काम करता है रडार
- ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) को भू-भेदी रडार भी कहा जाता है। यह जमीन खोदे बिना उसके अंदर की संरचना का पता लगाने वाली तकनीक है। रडार यंत्र जमीन की सतह पर चलाया जाता है और उससे विद्युत चुंबकीय तरंगें जमीन के भीतर भेजी जाती हैं।
- जमीन के अंदर अलग-अलग पदार्थ, जैसे मिट्टी, पत्थर, ईंट, खाली जगह या दूसरी ठोस संरचनाएं इन तरंगों को अलग-अलग तरीके से परावर्तित करते हैं। रडार इन लौटने वाले संकेतों को दर्ज करता है। कंप्यूटर में इन संकेतों का विश्लेषण करने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस स्थान पर जमीन के नीचे कोई संरचना है और वह लगभग कितनी गहराई पर है।
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