नईदुनिया प्रतिनिधि, बुरहानपुर। नेपानगर तहसील की बाकड़ी पंचायत का वन ग्राम नादियामाल नाम से भले ही मालामाल नजर आता है, लेकिन हकीकत में इस गांव की 200 से ज्यादा की आबादी हर सुविधा से वंचित है।
सुबह से घंटों मशक्कत करनी होती है
जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी पानी तक के लिए गांव की महिलाओं को सुबह से घंटों मशक्कत करनी पड़ती है। गांव से करीब दो किमी दूर पहाड़ पर बने एक गड्ढे से पथरीला रास्ता पार कर उन्हें पीने और दैनिक जरूरत के लिए पानी लाना पड़ता है।
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इस गांव तक पहुंचने के लिए न तो पक्की सड़क है और न बिजली की सुविधा है। आधुनिक युग में भी इस गांव के लोग दशकों पुराने ग्रामीण परिवेश में गुजर बसर करने विवश हैं।
ज्ञात हो कि कुछ समय पहले ऐसे ही आदिवासी गांवों की तस्वीर बदलने के लिए केंद्र सरकार की धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान चलाया गया था। आश्चर्यजनक तथ्य है कि इस अभियान के तहत पूरे देश में सबसे उत्कृष्ट कार्य बुरहानपुर में किया गया, लेकिन यह अभियान भी नादियामाल गांव के लोगों की तकदीर नहीं बदल पाया।
अधिकारियों की इस अनदेखी को लेकर गत दिवस ग्रामीणों ने बैठक की और सुविधाओं के लिए आंदोलन की चेतावनी दी है।
वन भूमि पर अतिक्रमण बता किया वंचित
इस संबंध में जब अधिकारियों से बात की गई तो उनका कहना था कि गांव के लोगों ने वन भूमि पर अतिक्रमण कर रखा है। इसी के चलते गांव में मूलभूत सुविधाओं का विस्तार नहीं किया जा सका।
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दूसरी ओर ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास जमीनों के पट्टे हैं और वे पीढ़ियों से यहां रहते आ रहे हैं। हाल ही में जिला प्रशासन ने वन ग्रामों को राजस्व में परिवर्तित करने का अभियान चलाया था। उसमें भी नादियामाल गांव को शामिल नहीं किया गया।
ग्रामीणों की मांग है कि गांव का तत्काल सर्वे कराया जाए और पेयजल की स्थाई व्यवस्था की जाए। सड़क का निर्माण कराया जाए, बिजली की सुविधा दी जाए और गांव में आंगनबाड़ी, स्कूल व स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
शिक्षा से भी वंचित हैं दर्जनों बच्चे
नादियामाल गांव में आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूल और बिजली जैसी सुविधाएं नहीं होने के कारण गांव के दर्जनों बच्चों का भविष्य भी खराब हो रहा है।
पहाड़ी रास्तों से पैदल अकेले वे सीवल अथवा बाकड़ी गांव नहीं जा पाते। जिसके कारण वे शिक्षा से दूर हैं। बिजली नहीं होने के कारण गांव के लोग खेतों में सिंचाई, इंटरनेट आदि का उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं।
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भीषण गर्मी में भी उन्हें बिना पंखे और कूलर के रहना पड़ता है। इसके अलावा झिरिया का पानी पीने से संक्रामक बीमारियों का खतरा बना रहता है।
गांव के लोग बताते हैं कि वर्षाकाल के दौरान यदि कोई बीमार हो जाए तो उसे अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। फिसलन भरे कच्चे रास्तों से कांधे पर ही ले जाना पड़ता है।
अधिकारियों का क्या कहना
प्रारंभिक जानकारी में वन भूमि पर अतिक्रमण की बात सामने आई है। बावजूद इसके गांव में जल्द पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। पूरे मामले की पड़ताल भी कराई जा रही है।
हर्ष सिंह, कलेक्टर
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