
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। भोजशाला को लेकर चला आंदोलन केवल धार्मिक या कानूनी लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह मालवा के सबसे बड़े जन आंदोलनों में भी शामिल हो गया। वर्षों तक चले इस संघर्ष में सत्याग्रह, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, कर्फ्यू और प्रशासनिक कार्रवाई जैसे कई घटनाक्रम सामने आए।
आंदोलन के दौरान 39 लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जबकि दो लोगों की मौत ने पूरे क्षेत्र का माहौल तनावपूर्ण बना दिया था। मंदिर पक्ष ने 1990 के दशक में आंदोलन को तेज करना शुरू किया। वर्ष 1994 में धार में सरस्वती वंदना और हनुमान चालीसा का पाठ प्रारंभ हुआ। इसके बाद विहिप, बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों ने भोजशाला मुक्ति आंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया।
छह दिसंबर, 1996 को बजरंग दल के आह्वान पर प्रदेश स्तरीय शौर्य दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाए। इसके बाद आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनने लगी। वर्ष 1997 में तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने मुस्लिम पक्ष को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति दी, जबकि हिंदू पक्ष के प्रवेश और पूजा-अर्चना पर प्रतिबंध लगाए गए। हिंदू संगठनों ने इसे धार्मिक अधिकारों का हनन बताते हुए बड़े आंदोलन की शुरुआत की।
इसके बाद गांव-गांव में धर्मरक्षा समितियां बनाई गईं और धार आंदोलन का केंद्र बन गया। आंदोलन के दौरान प्रशासन ने जिले के कई हिस्सों में धारा 144 लागू कर दी। 10 थाना क्षेत्रों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा था कि जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार भी हुआ। इसी दौर में 39 आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए और दो लोगों की मौत हुई।
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लगातार आंदोलन और जनदबाव के बाद आठ अप्रैल, 2003 को सरकार ने नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत हिंदू पक्ष को प्रतिदिन दर्शन और प्रत्येक मंगलवार पूजा के लिए प्रवेश की अनुमति दी गई। इस फैसले के बाद धार में विजय उत्सव मनाया गया और मंदिरों में महाआरती आयोजित हुई।