भोजशाला सुनवाई: 'अयोध्या मामले की तरह यहां भगवान पक्षकार नहीं', सलमान खुर्शीद ने स्वामित्व पर उठाए कानूनी सवाल
धार भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में 6 अप्रैल से चल रही सुनवाई बुधवार को भी जारी रही। ...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 22 Apr 2026 10:04:38 PM (IST)Updated Date: Wed, 22 Apr 2026 10:05:28 PM (IST)
धार भोजशाला सुनवाईHighLights
- वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने हाई कोर्ट में दी 2 घंटे तक दलीलें
- अयोध्या केस का उल्लेख कर कहा - यहां देवी-देवता पक्षकार नहीं हैं
- कोर्ट ने स्पष्ट किया - याचिका में 24 घंटे पूजा के अधिकार की मांग है
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में 6 अप्रैल से चल रही सुनवाई बुधवार को भी जारी रही। इस दिन मौलाना कलामुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने तर्क रखे, जो अधूरे रहे। लगभग दो घंटे चली सुनवाई के दौरान खुर्शीद ने अयोध्या फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले तो यह तय होना चाहिए कि भोजशाला का वास्तविक स्वामित्व किसका है।
स्वामित्व का निर्धारण आस्था और विश्वास से नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया से किया जा सकता है। अयोध्या मामले में रामलला विराजमान पक्षकार थे, लेकिन भोजशाला मामले में ऐसा नहीं है। अचल संपत्ति या जमीन को कानूनन व्यक्ति नहीं माना जा सकता। याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं है, इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
पूजा स्थल अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट की रोक का उल्लेख
खुर्शीद गुरुवार को अपने तर्क समाप्त करेंगे। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन अपने तर्क रखेंगे। बुधवार दोपहर ठीक ढाई बजे मामले में सुनवाई शुरू हुई। वर्चुअली जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता खुर्शीद ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के सामने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि पूजा स्थल (विशेष प्रविधान) अधिनियम के प्रविधानों में स्पष्ट है कि 15 अगस्त 1947 को धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी वही रहेगी। इस अधिनियम का उद्देश्य ही विवादों को समाप्त करना है। खुर्शीद ने बुधवार को फिर दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला जैसे मामलों में अंतिम फैसला सुनाने पर रोक लगा रखी है।
अयोध्या फैसले पर आधारित रहे तर्क और कोर्ट की टिप्पणी
एडवोकेट खुर्शीद ने बुधवार की अपनी बहस पूरी तरह से अयोध्या फैसले पर आधारित रखी। उन्होंने अयोध्या में एएसआइ के सर्वे में मिले साक्ष्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मूर्ति और जमीन को समान नहीं माना जा सकता। अयोध्या को लेकर जो याचिका निराकृत हुई है उसमें रामलला विराजित भी पक्षकार थे, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। भोजशाला मामले में देवी-देवता ने आपके सामने कुछ प्रस्तुत नहीं किया है। ऐसी स्थिति में हम यहां स्वामित्व का निर्धारण ही नहीं कर सकते। इस पर कोर्ट ने कहा कि हिंदू फ्रंट फार जस्टिस ने याचिका में स्वामित्व निर्धारण की मांग नहीं की है बल्कि 24 घंटे पूजा के अधिकार की मांग की है। इस पर खुर्शीद ने कहा कि जब स्वामित्व निर्धारण की मांग ही नहीं है तो इसका मतलब है कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि स्वामित्व के बगैर पूजा का अधिकार कैसे मिल सकता है।