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मालवा की मिट्टी का ‘हेल्थ कार्ड’ दे रहा खतरे का संकेत, जिंक, सल्फर और ऑर्गेनिक कार्बन की कमी से कमजोर हो रही उर्वरा शक्ति

कभी अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिए पहचान रखने वाला मालवा अब धीरे-धीरे अपनी सेहत खोता नजर आ रहा है। खेत बाहर से भले ही हरे-भरे दिखाई दें, लेकिन मिट्टी क...और पढ़ें

By Rais MohammadEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Thu, 02 Jul 2026 11:56:16 AM (IST)Updated Date: Thu, 02 Jul 2026 11:56:16 AM (IST)
मालवा की मिट्टी का ‘हेल्थ कार्ड’ दे रहा खतरे का संकेत, जिंक, सल्फर और ऑर्गेनिक कार्बन की कमी से कमजोर हो रही उर्वरा शक्ति
बदनावर की मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में मिट्टी परीक्षण करते हुए। (नईदुनिया प्रतिनिधि)

HighLights

  1. कभी अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिए पहचान रखने वाला मालवा अब धीरे-धीरे अपनी सेहत खोता नजर आ रहा है
  2. खेत बाहर से भले ही हरे-भरे दिखाई दें, लेकिन मिट्टी के भीतर छिपी सच्चाई चिंताजनक है
  3. बदनावर क्षेत्र में किए जा रहे मृदा परीक्षणों सामने आया कि जमीन की उर्वरा शक्ति लगातार घट रही है

पुरुषोत्तम शर्मा, नईदुनिया न्यूज, बदनावर (धार)। कभी अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिए पहचान रखने वाला मालवा अब धीरे-धीरे अपनी सेहत खोता नजर आ रहा है। खेत बाहर से भले ही हरे-भरे दिखाई दें, लेकिन मिट्टी के भीतर छिपी सच्चाई चिंताजनक है।

बदनावर क्षेत्र में किए जा रहे मृदा परीक्षणों सामने आया कि जमीन की उर्वरा शक्ति लगातार घट रही है। अधिकांश खेतों में आर्गेनिक कार्बन, जिंक और सल्फर जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी सामने आई है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने की होड़ में किसान अपनी जमीन की सेहत को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।


खरीफ सीजन की तैयारी के बीच किसान अपनी मिट्टी की जांच कराने पहुंच रहे हैं। कृषि विभाग को 1100 मिट्टी परीक्षण का लक्ष्य मिला था। इतने ही प्राप्त सैंपल में से बदनावर स्थित मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में अब तक 920 नमूनों का परीक्षण पूरा कर लिया गया है। इनमें से करीब 800 किसानों को उनकी परीक्षण रिपोर्ट भी वितरित की जा चुकी है। इसके साथ ही शासन की योजनाओं के तहत कपास एवं सोयाबीन के बीज प्रदर्शन कार्यक्रम के लिए जिन किसानों को बीज वितरित किए गए हैं, उन्हीं किसानों की मिट्टी का परीक्षण भी कराया जा रहा है। ऐसे किसानों की संख्या 837 होगी।

ऑर्गेनिक कार्बन की कमी सबसे बड़ी समस्या

मिट्टी की जांच में सबसे बड़ी चिंता आर्गेनिक कार्बन की कमी को लेकर सामने आई है। विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन का स्तर 0.50 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए, जबकि अधिकांश नमूनों में यह 0.20 से 0.40 प्रतिशत के बीच पाया गया है। यह स्थिति बताती है कि खेतों की मिट्टी धीरे-धीरे अपनी जीवंतता खो रही है। दरअसल, आर्गेनिक कार्बन मिट्टी की आत्मा माना जाता है। यही तत्व मिट्टी को भुरभुरी बनाता है, पानी रोकने की क्षमता बढ़ाता है और फसलों को पोषण उपलब्ध कराने वाले सूक्ष्मजीवों को जीवित रखता है। जब इसकी मात्रा घटती है, तो मिट्टी सख्त होने लगती है और उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

प्राकृतिक खेती कारगर

चौंकाने वाली बात यह है कि जिन किसानों ने प्राकृतिक या जैविक खेती को अपनाया है, उनके खेतों में आर्गेनिक कार्बन का स्तर 0.68 से 0.70 प्रतिशत तक पाया गया यानी जिन किसानों ने गोबर खाद, कम्पोस्ट और जैविक संसाधनों पर भरोसा किया, उनकी जमीन आज भी स्वस्थ बनी हुई है। यह आंकड़े केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि खेती की दिशा तय करने वाला संदेश हैं।

रासायनिक खादों की अंधी दौड़ का असर

पिछले दो दशकों में उत्पादन बढ़ाने के नाम पर रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया का उपयोग तेजी से बढ़ा है। तत्काल लाभ के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हुए, लेकिन अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की संरचना प्रभावित हुई है। लाभदायक जीवाणु और सूक्ष्मजीव नष्ट हो रहे हैं तथा भूमि की प्राकृतिक उर्वरता कमजोर पड़ रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि आर्गेनिक कार्बन और नाइट्रोजन का सीधा संबंध है। जब मिट्टी में कार्बन कम होता है तो नाइट्रोजन भी कम उपलब्ध होती है। परिणामस्वरूप किसान अधिक मात्रा में यूरिया डालते हैं और यह चक्र लगातार चलता रहता है। यदि कार्बन की मात्रा बढ़ाई जाए तो नाइट्रोजन की प्राकृतिक उपलब्धता भी बढ़ती है और अतिरिक्त यूरिया की आवश्यकता कम हो जाती है।

जिंक और सल्फर की कमी भी बढ़ा रही चिंता

मृदा परीक्षण में जिंक की कमी भी व्यापक रूप से सामने आई है। जहां इसका स्तर 0.50 से 0.90 प्रतिशत के बीच होना चाहिए, वहीं अधिकांश नमूनों में यह 0.40 से 0.60 प्रतिशत के बीच पाया गया। जिंक की कमी से पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है और उत्पादन क्षमता घटती है। सल्फर की स्थिति भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। अधिकांश नमूनों में इसका स्तर लगभग सात प्रतिशत पाया गया, जबकि विशेषज्ञ 11 प्रतिशत से अधिक को बेहतर मानते हैं। सल्फर फसलों में प्रोटीन निर्माण और गुणवत्ता सुधार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी लंबे समय में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकती है।

मिट्टी बची, तो खेती बचेगी

बदनावर की मृदा रिपोर्ट केवल कुछ आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि खेती के भविष्य का आईना है। खेतों में बढ़ती लागत, घटती उत्पादकता और उर्वरता में गिरावट का संबंध सीधे मिट्टी की बिगड़ती सेहत से जुड़ा हुआ है। यदि किसानों ने समय रहते जैविक खाद, फसल अवशेष प्रबंधन, हरी खाद और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को नहीं अपनाया तो आने वाले वर्षों में उपजाऊ मालवा की जमीन भी बंजर होने के खतरे से अछूती नहीं रहेगी।

बीज से पहले मिट्टी में तय होता है फसल का भविष्य

मृदा परीक्षण प्रयोगशाला के युवा उद्यमी गोकुल धाकड़ ने बताया कि आज जरूरत केवल अधिक उत्पादन की नहीं, बल्कि मिट्टी को जीवित रखने की है, क्योंकि फसल का भविष्य बीज से पहले मिट्टी में तय होता है। मृदा जांच रिपोर्ट यही संदेश दे रही है कि यदि धरती मां की सेहत सुधरेगी, तभी किसानों की समृद्धि भी सुनिश्चित होगी।

अगर आपकी जमीन भी हो रही है बीमार तो जांचे मिट्टी की 'नब्ज' और बढ़ाएं पैदावार