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‘गले का हार’ बना दतिया, यहां जीत से ज्यादा प्रतिष्ठा की बड़ी जंग

सिर्फ एक सीट पर चुनाव है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं बड़े हैं।

By Balram SoniEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Thu, 09 Jul 2026 09:15:23 AM (IST)Updated Date: Thu, 09 Jul 2026 09:15:54 AM (IST)
‘गले का हार’ बना दतिया, यहां जीत से ज्यादा प्रतिष्ठा की बड़ी जंग
गांव में दुकान चलाने वाले चंद्रभान को चुनाव से ज्यादा उपज की चिंता है, कम पानी की आशंका में मूंगफली बोई है। नईदुनिया

HighLights

  1. दतिया विधानसभा उपचुनाव
  2. मतदाता की नजर बादलों पर-नेताओं की वोटों पर
  3. भाजपा सरकार के कामकाज-योजनाओं को तो कांग्रेस सहानुभूति को बना सकती है मुद्दा

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। बुंदेलखंड की पुरानी कहावत आज भी गांव की चौपालों और चाय की दुकानों पर सुनाई देती है- ‘झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार’। लोकमानस में यह कहावत झांसी को संघर्ष और दतिया को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानती है। रियासतों का दौर भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन दतिया की राजनीतिक अहमियत आज भी बरकरार है। यही वजह है कि इस छोटे से विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव पूरे प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब राजा के गले का हार नहीं, बल्कि मतदाताओं के फैसले से किसी राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा का ‘हार’ बनने जा रहा है।

सिर्फ एक सीट पर चुनाव है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं बड़े हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के लिए संगठन और सरकार के प्रदर्शन पर जनता की मुहर हासिल करने का अवसर है, तो कांग्रेस जनाधार बरकरार रखने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का मौका देख रही है। यही कारण है कि दोनों दलों के नेताओं की आवाजाही बढ़ रही है। जातीय समीकरणों के साथ स्थानीय नाराजगी, संगठनात्मक मजबूती का गणित भी साधा जा रहा है।


मतदाता की चिंता कुछ और

चुनावी हलचल के बीच यहां सबसे बड़ी चिंता वोट नहीं, बल्कि वर्षा है। कम वर्षा की आशंका से खेतों में बोई धान, उड़द, मूंग और मूंगफली की फसल को लेकर किसानों की बेचैनी बढ़ती जा रही है। दतिया शहर से सात किलोमीटर दूर रामसागर और बड़ौनी गांव में सड़क किनारे परचून की दुकान पर बैठे किसान चंद्रभान कुशवाह कहते हैं, ‘पहले ही लग रहो कि पानी कम बरसेगो, इसीलिए धान की जगह मूंगफली बो दई। अब पानी गिर गओ तो ठीक, नई तो नुकसान तय है।’ पास बैठे किसान सियाचरण बताते हैं, 500 रुपये घंटे के हिसाब से ट्रैक्टर से जुताई कराई, बीज-खाद उधार में ले आए। अब ऊपर वाले की मेहर हो जाए तो कज्ज उतर जाए।

उपचुनाव की चर्चा पर दोनों चेहरे पर खास उत्साह दिखाई नहीं देता। एक ही स्वर में कहते हैं, कोऊ जीते, हमाय लाएं कोनऊ फायदा नईयां...पानी बरस जाए, वही बड़ी बात है। यही जवाब दतिया के मौजूदा चुनावी माहौल को समझने की पहली कुंजी भी है। उधर शहर में श्री पीताबंरा पीठ के पश्चिमी द्वार के सामने नाश्ते की दुकान पर खड़े महिपाल दांगी कहते हैं, विधायकजी को जिस आरोप में हटाया है, वो भी चुनाव मे मुद्दा बनेगा। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता किस आधार पर फैसला करता है।

मुकाबला पूरी तरह खुला, त्रिकोणीय होने के भी आसार

दतिया की राजनीति हमेशा व्यक्तित्व, जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। जमीनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि मुकाबला अभी पूरी तरह खुला है, लेकिन राजनीतिक पिच पर तीन प्रमुख धुरी धीरे-धीरे असर दिखा रही हैं। पहला, सत्ताधारी दल की संगठनात्मक मजबूती और सरकार के कामकाज का संदेश, दूसरा, विपक्ष की स्थानीय पकड़ और सहानुभूति की राजनीति, और तीसरा, स्थानीय स्तर पर उभरता नया और सक्रिय चेहरा, जो परंपरागत समीकरणों को प्रभावित कर रहा है।

राजनीतिक गलियारों और गांव-शहर की चौपालों में जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह पूर्व गृह मंत्री डा. नरोत्तम मिश्रा का है। पार्टी कार्यक्रमों और सभाओं में उनका हालिया ‘आत्ममंथन’ कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच अलग-अलग तरीके से देखा जा रहा है। दूसरी ओर राजेंद्र भारती के विधायकी से हटने का मामला भी मतदाताओं के बीच लगातार चर्चा में है। इसी बीच नए चेहरे दामोदर यादव ने पिछले एक वर्ष में लगातार सक्रियता से राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। सरकार के खिलाफ समय-समय पर दिए गए बयानों को लेकर स्थानीय राजनीति में अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। उनके राजनीतिक रुख के बावजूद प्रशासनिक राजनीतिक स्तर पर पूरी तरह किनारे नहीं किया गया है।