मां से दुष्कर्म के झूठे आरोप में 10 साल जेल में बिताए, हाई कोर्ट ने निरस्त की उम्रकैद की सजा; आरोपी बरी
Gwalior High Court Verdict: ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त 2017 को उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 09:54:25 AM (IST)Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 09:55:02 AM (IST)
HighLights
- गवाही में मिलीं कई गंभीर विसंगतियां
- 2 महीने की देरी और सबूतों का अभाव
- संदेह का लाभ देकर तत्काल रिहाई के निर्देश
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मां से दुष्कर्म के आरोप में 9 मई 2016 से जेल में बंद एक व्यक्ति को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने लगभग दस वर्ष बाद दोषमुक्त कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त 2017 को उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद उस निर्णय को निरस्त कर आरोपी को बरी कर दिया।
कोर्ट को बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां मिलीं
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यौन अपराध के मामलों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है, लेकिन इसके लिए वह गवाही पूरी तरह विश्वसनीय, सुसंगत और उच्च स्तर की होनी चाहिए। इस मामले में अदालत को पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां मिलीं, जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह उत्पन्न हुआ।
अदालत ने यह भी पाया कि कथित घटना के लगभग दो महीने बाद प्राथमिकी दर्ज कराई गई। वहीं, जिस मोबाइल रिकॉर्डिंग को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया गया था, उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसके अलावा स्वतंत्र और वैज्ञानिक साक्ष्य भी आरोपों की पुष्टि करने में असफल रहे।
कोर्ट ने यह भी किया उल्लेख
फैसले में हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाहों के आरोपी के साथ पहले से विवादपूर्ण संबंध थे। ऐसी परिस्थितियों में उनके बयानों का अधिक सतर्कता से परीक्षण आवश्यक था। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य और गवाहियों के आधार पर अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा निरस्त कर दी और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य प्रकरण में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।