नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। दतिया विधानसभा सीट पर 2023 में डॉ. नरोत्तम मिश्रा की हार प्रदेश की सबसे चर्चित चुनावी घटनाओं में रही। करीब दो दशक तक दतिया की राजनीति के केंद्र में रहे और शिवराज सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में शामिल डॉ. मिश्रा को कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने लगभग 7,700 मतों से हराया। भाजपा की प्रदेशव्यापी जीत के बीच उनकी हार ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंकाया। अब, 2026 के उपचुनाव में भाजपा ने उनकी जगह नया उम्मीदवार उतारकर यह संकेत दे दिया है कि पार्टी ने 2023 के चुनावी संदेश को गंभीरता से लिया है। 2023 के चुनाव परिणाम बताता है कि यह हार किसी एक कारण से नहीं हुई। विकास कार्यों के बावजूद स्थानीय स्तर पर कई ऐसे कारण रहे, जिन्होंने चुनाव का रुख बदल दिया।
कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क पहले जैसा नहीं रहा
डॉ. मिश्रा के कार्यकाल में दतिया में मेडिकल कॉलेज, सड़कें, पुल, धार्मिक पर्यटन, सिंचाई और शहरी विकास से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए। भाजपा ने इन्हीं उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन मतदान के समय विकास से ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि मंत्री बनने के बाद डॉ. मिश्रा का आम लोगों और कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क पहले जैसा नहीं रहा। गांवों में यह धारणा भी बनी कि समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को पहले जैसी सहज पहुंच नहीं मिल रही है।
राजेंद्र भारती गांव-गांव पहुंचे
चुनावी आंकड़ों ने भी यही संकेत दिए। शहरी क्षेत्रों में भाजपा को अपेक्षाकृत बेहतर समर्थन मिला, लेकिन ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस ने निर्णायक बढ़त बनाई। कई गांवों में कांग्रेस ने पिछली बार की तुलना में अपने मतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ग्रामीण मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत संपर्क को विकास कार्यों से अधिक महत्व दिया।
कांग्रेस ने भी चुनावी रणनीति उसी आधार पर तैयार की। प्रत्याशी राजेंद्र भारती ने गांव-गांव पहुंचकर लगातार जनसंपर्क किया और चुनाव को स्थानीय बनाम बड़े नेता की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और स्थानीय उपेक्षा जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया। इसका असर मतदान पर दिखाई दिया।
बूथ प्रबंधन रहा कमजोर
भाजपा के भीतर भी पूरी तरह एकजुटता नजर नहीं आई। स्थानीय स्तर पर कुछ पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चा चुनाव के दौरान लगातार होती रही। बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी पहले जैसी मजबूत नहीं दिखी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संगठन पूरी क्षमता से सक्रिय होता तो मुकाबला अलग हो सकता था। लगातार लगभग 17 वर्षों तक विधायक रहने के कारण सत्ता विरोधी भावना भी चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक बनी। मतदाताओं के एक वर्ग ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया। खासकर युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं में परिवर्तन की इच्छा दिखाई दी। इसके साथ ही कांग्रेस ने जातीय और सामाजिक समीकरणों को भी अपने पक्ष में साधने की कोशिश की, जिसका उसे लाभ मिला।
केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं
2026 के उपचुनाव के घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट किया है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत जनाधार और कार्यकर्ताओं पर प्रभाव अब भी बना हुआ है। टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों का सड़कों पर उतरना और व्यापक विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि वे आज भी दतिया भाजपा की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। हालांकि 2023 का चुनाव यह भी बताता है कि केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं होती। संगठन की मजबूती, स्थानीय समीकरण, जनसंपर्क और बूथ स्तर की सक्रियता भी उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाती है।
नये चेहरे से क्या बदलेगा चुनावी गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने उपचुनाव में उम्मीदवार बदलकर 2023 की हार से मिले संदेश को स्वीकार किया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नया चेहरा उतारने से दतिया का चुनावी गणित बदलता है या डॉ. नरोत्तम मिश्रा की अनुपस्थिति भाजपा के लिए नई चुनौती बनती है। फिलहाल इतना तय है कि 2023 की हार केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि दतिया की राजनीति में बदलते जनमत का महत्वपूर्ण संकेत थी।