
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। डबरा क्षेत्र में अवैध खनन के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाते हुए खनन कारोबारी अशोक सिंह यादव की तीसरी खदार को भी एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया है। बिलौआ के पास जाफरपुर स्थित वह तीसरी संचालित खदान में भी एक सप्ताह तक कोई भी खनन गतिविधी नहीं होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवधि में न तो ब्लास्टिंग होगी, न खनन और न ही पहले से निकाले गए खनिज का परिवहन किया जाएगा। इस आदेश का कड़ाई से पालन कराने की जिम्मेदारी ग्वालियर कलेक्टर को सौंपी गई है। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए।
कहा कि अदालत के समक्ष उपलब्ध परिस्थितियों से यह प्रतीत होता है कि मूल रिकॉर्ड छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। अब इस मामले में 10 अगस्त को फिर सुनवाई होगी, जिसमें राज्य सरकार द्वारा अवैध खनन और अवैध परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर विचार किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान अशोक सिंह यादव की ओर से अधिवक्ता प्रकाश बरारू को यह बताने के लिए कहा गया कि मूल रिकार्ड साइट आफिस से क्यों हटाया गया? उन्होंने अदालत को बताया कि वे मूल रिकार्ड प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं। इसके बाद उन्हें एक घंटे का समय दिया गया। बरारू ने 1 जुलाई 2026 से शुरू होने वाला एक रजिस्टर और कुछ मूल लोडिंग रसीदें पेश कीं। लेकिन अदालत ने पाया कि रजिस्टर में प्लांट संबंधी कोई विवरण दर्ज नहीं है।
जब कोर्ट ने पूछा कि रजिस्टर साइट आफिस में न होकर शहर स्थित थाटीपुर कार्यालय में क्यों रखा गया, तो जवाब दिया गया कि वहीं रजिस्टर तैयार होता है और वह लोडिंग रसीदों के आधार पर बनाया जाता है।अदालत ने यह भी नोट किया कि लोडिंग रसीदों का विवरण ई-खनिज पोर्टल पर अपलोड किया गया है, लेकिन यह बताने वाला कोई रिकार्ड पेश नहीं किया गया कि वास्तव में कितनी मात्रा में खनिज का उत्खनन हुआ।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह स्वीकार करना बेहद कठिन है कि बिलौआ के पास जाफरपुर स्थित साइट आफिस में खनिज उत्खनन से संबंधित कोई रिकार्ड ही नहीं रखा जाता। अदालत ने यह भी पाया कि जिन दो खदानों में 16 जुलाई 2026 के आदेश से खनन पर रोक लगाई गई थी, उनका रिकॉर्ड भी पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि इससे यह साफ प्रतीत होता है कि अशोक सिंह यादव अब भी मूल रिकार्ड अदालत से छिपा रहे हैं। आदेश में कहा गया कि उनकी बोनाफाइड (सद्भावना) गहरे संदेह के घेरे में है।
अदालत ने कहा कि उसके समक्ष यह आरोप है कि जिन दो खदानों में खनन पर रोक लगी हुई है, वहां तीसरी संचालित खदान की आड़ में अवैध खनन किया जा रहा है। इसी आशंका को देखते हुए कोर्ट ने जाफरपुर स्थित तीसरी खदान की सभी गतिविधियों पर भी एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगले एक सप्ताह में वह अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए दिशा-निर्देश (गाइडलाइन) तैयार करेगा। इसके बाद 17 अगस्त से तीसरी खदान में खनन दोबारा शुरू करने की अनुमति दी जाए या नहीं, इस पर 14 अगस्त के आसपास विचार किया जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रस्तुत किया गया रजिस्टर केवल 1 जुलाई 2026 से शुरू होता है। जबकि हर महीने अलग-अलग रजिस्टर रखने की व्यवस्था नहीं बताई गई है। ऐसे में अदालत ने टिप्पणी की कि यह भी संदेहास्पद है कि प्रस्तुत रजिस्टर वास्तव में मूल रजिस्टर है या नहीं। इसके बाद रजिस्टर और मूल लोडिंग रसीदों को सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखकर अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडकर की अभिरक्षा में भेजने के निर्देश दिए गए।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया कि खनन क्षेत्र की ड्रोन से हवाई वीडियोग्राफी कराने के लिए खनिज संचालक को पत्र भेजा गया है और इसमें कम से कम सात दिन लगेंगे। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि कलेक्टर का यह रवैया अदालत की समझ से परे है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक दिन पहले ही यह सामने आया है कि एक खनन कारोबारी साइट ऑफिस से पूरा रिकार्ड हटा चुका है और अब सात दिन का समय मांगने का अर्थ खनिकों को भारी मशीनें हटाने का अवसर देना होगा।
अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पूरे खनन क्षेत्र और क्रशर क्षेत्रों की ड्रोन से हवाई वीडियोग्राफी हर हाल में अगले दिन तक कराई जाए और उसकी सीडी 10 अगस्त को कलेक्टर अपने शपथपत्र के साथ अदालत में पेश करें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में माइनिंग एरिया में क्रशर क्षेत्र भी शामिल माना जाएगा, इसलिए यह तर्क स्वीकार नहीं किया जाएगा कि क्रशर क्षेत्र का अलग से उल्लेख नहीं था।