
अमित मिश्रा, नईदुनिया ग्वालियर: ग्वालियर में पुलिस व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका तेजी से मजबूत होती दिखाई दे रही है। खाकी वर्दी में महिला पुलिस अधिकारी और सिपाहियों की बढ़ती भागीदारी न केवल सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बना रही है, बल्कि समाज की सोच में भी सकारात्मक बदलाव ला रही है। वर्तमान समय में ग्वालियर की लगभग 75 प्रतिशत शहरी सुरक्षा महिला पुलिस अधिकारियों के हाथों में है।

यह स्थिति इसलिए भी विशेष है क्योंकि जिले में पदस्थ चार अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों में से तीन महिलाएं हैं। केवल ग्रामीण क्षेत्र की जिम्मेदारी पुरुष अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पास है, जबकि शहर की कानून-व्यवस्था पूरी तरह महिला अधिकारियों के भरोसे है।
ग्वालियर में वर्तमान में तीन महिला अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अलग-अलग क्षेत्रों की कमान संभाल रही हैं। विदिता डागर पूर्व क्षेत्र की एएसपी हैं, अनु बेनीवाल मध्य क्षेत्र की एएसपी के रूप में कार्यरत हैं और सुमन गुर्जर पश्चिम क्षेत्र की जिम्मेदारी निभा रही हैं।
इसके अलावा उप पुलिस अधीक्षक स्तर पर भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। हिना खान यूनिवर्सिटी सर्किल की सीएसपी हैं, जबकि शिखा सोनी महिला शाखा में डीएसपी के रूप में कार्यरत हैं।
शहर के कई महत्वपूर्ण थानों की जिम्मेदारी भी महिला पुलिस अधिकारियों को सौंपी गई है। इनमें इंदरगंज थाना प्रभारी के रूप में दीप्ति तोमर, बिलौआ में इला टंडन, मुरार में मैना पटेल, कोतवाली में मोहिनी वर्मा, माधौगंज में दिव्या तिवारी और महिला थाना प्रभारी के रूप में रश्मि भदौरिया कार्यरत हैं।
इसके अलावा चौकी और साइबर सेल में भी महिला अधिकारी जिम्मेदारी निभा रही हैं। बेहटा चौकी की प्रभारी क्षमा राजौरिया हैं, बड़ागांव में शिखा दंडोतिया तैनात हैं और साइबर सेल की कमान रजनी रघुवंशी संभाल रही हैं।
महिला पुलिस अधिकारियों ने कई बड़े और सनसनीखेज मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई है। पिछले साल नवंबर में कुख्यात गुंडे कपिल यादव को मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया था। इसके अगले ही दिन जब उसके साथियों ने एक सराफा कारोबारी पर फायरिंग की, तब एएसपी अनु बेनीवाल और उनकी टीम ने कुछ ही घंटों में आरोपितों को पकड़ लिया।
इसी तरह कंपू क्षेत्र में हाल ही में हुई दो लूट की घटनाओं का भी खुलासा महिला अधिकारियों की टीम ने कुछ ही दिनों में कर दिया। वहीं गोला का मंदिर क्षेत्र में महिला के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना में आरोपित तक पहुंचने में महिला उप निरीक्षक की अहम भूमिका रही।
महिला पुलिस अधिकारियों की सक्रियता का असर अपराध के आंकड़ों में भी दिखाई दिया है। वर्ष 2025 में वर्ष 2024 की तुलना में कई गंभीर अपराधों में कमी दर्ज की गई।
2025 में हत्या के 41 मामले दर्ज हुए, जबकि 2024 में यह संख्या 58 थी। हत्या के प्रयास के मामले 115 से घटकर 85 हो गए। अपहरण के मामले 343 से घटकर 291 हुए। दुष्कर्म के मामले 217 से घटकर 203 हुए।
इसी तरह लूट के मामले 57 से घटकर 17 और चोरी के मामले 537 से घटकर 369 हो गए।
जनवरी 2026 के आंकड़े भी अपराध नियंत्रण की दिशा में सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। इस दौरान हत्या के पांच मामले दर्ज हुए, जो जनवरी 2025 के बराबर हैं। हत्या के प्रयास के मामले नौ से घटकर सात हो गए। अपहरण के मामले 26 से घटकर 17 हो गए और चोरी के मामले 36 से घटकर 22 दर्ज किए गए।
महिला पुलिस अधिकारी थानों में आने वाले फरियादियों की सुनवाई खुद करती हैं, खासकर महिला शिकायतकर्ताओं की। कई बार महिलाएं अपनी समस्याएं पुरुष पुलिसकर्मियों के सामने खुलकर नहीं बता पातीं।
घरेलू विवाद और पति-पत्नी के झगड़े जैसे मामलों में महिला अधिकारी काउंसलिंग के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करती हैं, जिससे कई परिवार टूटने से बच जाते हैं।
क्षेत्र में महिला पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी से महिलाओं और युवतियों में सुरक्षा की भावना भी बढ़ी है। समाज में यह संदेश जा रहा है कि महिलाएं अब केवल घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी जिम्मेदारी निभा रही हैं।
मध्यप्रदेश की बेटियों में अब सेना में शामिल होने का उत्साह भी बढ़ रहा है। हाल ही में हुई अग्निवीर भर्ती में महिला अभ्यर्थियों की रिकॉर्ड संख्या देखने को मिली, जो महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास और देशसेवा की भावना को दर्शाती है।
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