
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। बुधवार सुबह ब्रिक्स सम्मेलन में आए सात देशों के 16 विदेशी मेहमान इंदौर के ऐतिहासिक राजवाड़ा को देखने पहुंचे। यहां पर उन्हें शहर के इतिहासकारों ने इंदौर के ऐतिहासिक कृषि महत्व की जानकारी दी।
मेहमानों को बताया गया कि इंदौर में काली उपजाऊ मिट्टी, उचित जलवायु व पर्याप्त पानी होने के कारण यहां पर कपास की खेती शुरू हुई। इसके साथ ही यहां पर अफीम कारोबार भी होलकर काल में शुरू हुआ। इंदौर से विदेश तक कपड़ा व अफीम के व्यापार के बारे में जानकारी दी गई।
इतिहासकार जफर अंसारी ने उस दौर में अपने द्वारा संग्रह किए गए अफीम को नापने में उपयोग होने वाले तराजू के बाट भी दिखाए। इंदौर के 1921 के ग्रामीण क्षेत्र के जनगणना पत्रक को दिखाया। मेहमानों को होलकर काल में बच्चों के खेल में उपयोग होने वाले सोने व चांदी के लट्टू दिखाए गए। इसके अलावा होलकर कालीन पुरानी सील जो इंदौर की मिलों में बने तैयार कपड़ों पर लगाई जाती थी, जिस पर 'वेरी फाइन क्वालिटी' (Very Fine Quality) लिखा रहता था, उसे भी दिखाया गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इंदौर में होलकर सेंटिनल पेपर, जो इंदौर से प्रकाशित होता था, उसे दिखाया गया। इसमें जनता से अपील की गई है कि अपना पैसा बचाएं और कृषि का विस्तार करें।
इतिहासकार शर्वाणी ने उन्हें देवी अहिल्याबाई होलकर की कृषि नीति के बारे में बताया कि उस समय कृषकों को 12 फलदार पेड़ लगाने के लिए कहा जाता था। इसमें से सात पेड़ों के फल का उपयोग किसान अपने लिए करते थे और पांच पेड़ों के फल होलकर शासन के लिए दिए जाते थे।
उन्हें बताया गया कि 1923 में इंदौर में कंपोस्ट खाद बनाई जाती थी। ब्रिटेन से मिस्टर हावर्ड इसे देखकर आश्चर्यचकित हुए थे। 1935 में महात्मा गांधी ने भी इंदौर के पौध संस्थान, जो अब कृषि महाविद्यालय है, उसमें बनी कंपोस्ट यूनिट को देखा था। विदेशी मेहमानों ने राजवाड़ा परिसर में गणेश हॉल देखा और राजवाड़ा की आर्किटेक्चर के बारे में जाना। परिसर में बनी गैलरी का भी उन्होंने भ्रमण किया।
राजवाड़ा परिसर में प्रशांत इंदूरकर व अन्य सदस्यों ने होलकर कालीन वेशभूषा में मेहमानों का स्वागत किया। इंदूरकर ने होलकर शासन काल में राज दरबार में जिस तरह महाराज के आने के पहले हरकारा लगाया जाता था, उसी तरह हरकारा लगाया। उनकी वेशभूषा को देखकर विदेशी मेहमान प्रभावित हुए और उनके साथ फोटो भी लिए।
'भारत में रासायनिक खाद का उपयोग किए बिना ऑर्गेनिक खेती हो रही है। यह पर्यावरण व आम लोगों के लिए बेहतर है। हम भारत में ऑर्गेनिक खेती के तरीके को समझने आए हैं। इंदौर की मेहमाननवाजी व यहां का खान-पान हमें काफी पसंद आया।' - रॉबर्ट मोकेस्टा, साउथ अफ्रीका